Wednesday, April 6, 2011

देश की एकता को चुनौती देते जहरीले विचार


चिदम्बरम स्वभाव से ही उत्तर-पू र्व क्षेत्रों के विरो धी हैं। देश में सार्वजनिक तौर पर इन क्षेत्रों का मजाक उड़ाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। अब उनके अंदर छिपा जहर सार्वजनिक हो गया है। भारत की भौगोलिक एकता के लिए इतने जहरीले व्यक्ति का गृहमंत्री की कुर्सी पर बना रहना खतरनाक है। देश की एकता, अखण्डता किसी भारतवंशी के लिए महत्व का विषय है। चिदम्बरम को स्मरण दिलाने की जरूरत है कि उनके जहरीले विचार देश की एकता को चुनौती देने वाले हैं
गृह मंत्री पी. चिदम्बरम राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति दुराग्रह का भाव रखते हैं, ऐसा मेरा शुरू से मानना है। उन्हें मैंने 1991 के बाद से आने वाली सभी सरकारों में मंत्री के रूप में देखा है। कभी एक शब्द हिंदी में बोलते मैंने नहीं सुना। एच.डी. देवगौड़ा 1996 में प्रधानमंत्री थे। उन्होंने फैसला किया कि राष्ट्र के नाम सम्बोधन हिंदी में ही करेंगे। उन्होंने अपने वचन का पालन किया। उनके वित्त मंत्री के रूप में चिदम्बरम ने काम किया लेकिन अपने प्रधानमंत्री की घोषणाओं का उन पर प्रभाव नहीं पड़ा। गृह मंत्री ने अपने अंदर पलने वाले जहर का खुलासा अमेरिकी राजनयिक के सामने कर दिया। अपने राज नेताओं की खूबी है कि वे देश की जनभावना का ध्यान कम रखते हैं। वे अमेरिकी अंग्रेजी प्रभुओं को खुश रखने में अपने सफल राजनीतिक जीवन का रहस्य ढूंढते हैं। अंग्रेजी विश्वविद्यालयों में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अंग्रेजी भाषा को अंग्रेजी राज की सर्वश्रेष्ठ देन घोषित करते हैं। चिदम्बरम तमिलनाडु का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। उस राज्य का जनमानस हिंदी के खिलाफ है। उसका प्रभाव गृह मंत्री के व्यक्तित्व पर रहता है।
हिंदी राज्यों के बिना अकल्पनीय है भारत
उन्हें भारत की आर्थिक तरक्की की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि देश के भूगोल में हिंदी बहुल अथवा उत्तर भारत के कुछ राज्य नहीं होते तो हमारी तरक्की की रफ्तार बढ़ जाती। यह उनकी अज्ञानता का सबसे बड़ा सबूत है। हिंदी बहुल राज्यों को अलग कर क्या भारत नाम की कल्पना की जा सकती है? भारत के शरीर से आत्मा को अलग कर शरीर की कल्पना की जा सकती है। देश के तटवर्त्ती राज्यों की तरक्की के ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण रहे हैं। करीब छ: सौ साल पहले पुर्तगाली नाविक वास्को डिगामा कालीकट आया था। दक्षिण भारत से यूरोप के जलमार्ग के सबसे नजदीक के रास्ते की उसने तलाश की उसके बाद से भारतीय उत्पादों की धूम यूरोपीय बाजारों में हो गई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है उत्तर की
दक्षिण भारत में जिन यूरोपीय देशों ने धावा वोला, उनका मूल उद्देश्य अपने व्यापार को बढ़ाना था। उत्तर भारत में 1200 वर्ष पहले से खैबर वोलन के रास्ते यूनान, समरकंद, मंगोलिया आदि देशों के आक्रमणकारी आते रहे। उनका उद्देश्य भारत की सम्पदा को लूटकर अपने देश वापस जाना था। केवल मुगलों का खानदान भारत में टिका और 300 वर्षो तक का भारतीय इतिहास उनके शासन का काल माना जा सकता है। उन्होंने अपने शासन में कला साहित्य, संगीत के क्षेत्र में योगदान अवश्य किया किंतु उनका शासनकाल आंतरिक विद्रोह को दबाने के नाम पर दमन और लूट का भी कार्यकाल है। अंग्रेजी सरकार ने तो 1857 से 1942 तक अपने साम्राज्य की सारी शक्ति इन्हीं क्षेत्रों के दमन में लगा दिया। अंग्रेजी राज के खिलाफ जनविद्रोह का लम्बा अध्याय हृदय प्रदेशों में लिखा गया। जितना उग्र विद्रोह उतना ही क्रूर दमन; 1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजी पलटन ने गंगा, जमुना, घाघरा के जलमार्ग को चुना और इन्हीं क्षेत्रों के सुदूर गांवों और इलाकों में हजारों की संख्या में निदरेष जनता मारी गई। मुगल दौर में भी पलटन को आसानी से पहुंचाने के लिए जलमार्ग का ही इस्तेमाल होता था। इसलिए गंगा, जमुना, घाघरा का मैदान दमन क्षेत्र था, जहां के गांव के गांव और कस्बे लूटे-उजाड़े गए। 1942 का संग्राम भी इन्हीं क्षेत्रों में लड़ा गया।
विदेशी जुल्म से कभी नहीं भिड़े तटीय राज्य
तटीय राज्यों ने विदेशी जुल्म के खिलाफ कभी बगावत नहीं की। 1942 के अंतिम विद्रोह में उनकी साझीदारी नाम मात्र की थी। उन क्षेत्रों में नाव से यातायात के सुगम रास्तों की जानकारी थी। वहां के जलमागरे का उपयोग व्यावसायिक और व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया गया। उत्तर भारत के दुर्गम र्दे और जलमार्ग इन क्षेत्रों को लूट और दमन के माध्यम थे। स्वाभाविक था हुकूमत करने वालों ने इन क्षेत्रों को हीनता की नजर से देखते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देना तो दूर व्यापार और उद्योग के सभी साधनों को नष्ट करने में अपनी शक्ति लगा दी। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति होने से पहले बंगाल, बिहार के सुदूर क्षेत्रों में हाथ से तैयार कपड़े की खपत ब्रिटेन और यूरोप खाड़ी के देशों में बड़ी मात्रा में होती थी। मशीन से तैयार ब्रिटिश कपड़े की खपत को बढ़ाने के लिए इन क्षेत्रों में होने वाले कपड़े के उत्पादों पर आक्रमण किए। करघे बंद कराए गए।
औपनिवेशिक जकड़न
ढाका के आसपास मलमल तैयार करने वाले कारीगरों के अंगूठे काट लेने के फरमान जारी किए गए। बड़े महानगर जिन्हें अंग्रेजों ने बसाया था। सूरत और मुम्बई के इर्द-गिर्द आधुनिक कपड़े की मिलें खोली गई। बिहार, बंगाल के सुदूर ग्रामीण इलाकों में पटसन से तैयार होने वाले बोरे बनाने की पद्धति को तोड़कर चटकल मिलें कलकत्ता में बनाई गई जहां ग्रामीण क्षेत्रों में भुखमरी के शिकार लोग इन महानगरों में रोजी तलाशने के लिए विवश हुए। तटीय राज्यों के लोग समुद्री मार्ग से यूरोप, अफ्रीका के देशों में बड़ी संख्या में व्यवसाय व ऊंची पढ़ाई के लिए जाने लगे। उत्तरी हिंदुस्तान के गरीब निरक्षर लोगों को ठेके पर मजदूर बनाकर यूरोपीय कॉलोनियों में खेती में काम करने के लिए जबरन बसाया गया। डच, अंग्रेज, पुर्तगाली शासक व्रिटिश गुयाना, मॉरिशस, ट्रिनिडाड आदि टापुओं में जंगल-झाड़ में ले जाकर पटक दिए। उन्हें मजबूरन वहां श्रम देकर आधी-अधूरी कमाई से अपना काम चलाना था।
दमन और लूट उत्तर ने ही झेला
चूंकि तटीय राज्यों में अंग्रेजी जानने वालों की फौज जल्द तैयार हुई। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं, निम्न शहरी धंधों, घरेलू साफ-सफाई के काम में अच्छे वेतन पर तटीय राज्यों के प्रवासी भारतीय लगाए गए। उनके माध्यम से मसाले, चाय, चीनी के उत्पाद यूरोपीय देशों के लोगों की पसंद बने। जलमार्ग ही व्यापार का एक मात्र साधन था जिससे सम्पदा का अर्जन इन क्षेत्रों ने किया। उत्तरी भारत दमन और लूट के कारण शोषण और पिछड़ेपन का शिकार होता रहा। चिदम्बरम को भारत की तरक्की और पिछड़ेपन के कारकों में भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों की समीक्षा का न तो आधार है न ही इन क्षेत्रों के इतिहास का ज्ञान है। इसलिए उनकी टिप्पणी पूर्वाग्रह ग्रस्त अज्ञानतापूर्ण अभिव्यक्ति ही मानी जा सकती है।
हिंदी के विरुद्ध षड्यंत्र
आजादी के बाद से सत्ता प्रतिष्ठानों से इन क्षेत्रों की जनभाषा हिंदी हमेशा षड्यंत्र द्वारा दूर की गई। न्याय, कानून, व्यापार, प्रशासन आदि सभी स्तरों से हिंदी का भोजन अंग्रेजी करती जा रही है। जिसके कारण सभी हिंदीभाषी राज्य भाषायी गुलामी के शिकार हुए। आजाद भारत में भी व्यापार अैर उद्योग की सम्पूर्ण भाषा अंग्रेजी हो गई। तरक्की के मुख्य दरवाजों से हिंदी खदेड़ दी गई। गृह मंत्रालय के जिम्मे संसद ने राजभाषा के पद पर हिंदी को प्रतिष्ठित कराने का काम सौंपा। चिदम्बरम के गृह मंत्रालय में आते पूरा मंत्रालय अंग्रेजी समर्थकों का अड्डा वन गया। राजभाषा समारोहों में भी गृह मंत्री और उनके अधिकारी अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं।
पिछड़े पन की जड़ में भाषायी गुलामी
आर्थिक औद्योगिक क्षेत्र में इन इलाकों के पिछड़ेपन की जड़ में भाषायी गुलामी है। उच्चशिक्षा ,चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधकीय ज्ञान का क्षेत्र अंग्रेजी के कब्जे में हो गया। अखिल भारतीय सेवाओं से पुन: हिन्दी निर्वासित कर दी गई। हिंदी क्षेत्रों के पिछड़ेपन के बुनियादी कारणों में इन क्षेत्रों का विद्रोही स्वभाव है। आजाद भारत के भी विद्रोह चाहे 1967, 1977, 1989 में हुए सभी का दायरा उत्तरी- मध्य भारत का इलाका था इसलिए षड्यंत्र रचकर दिल्ली के राजकर्ता इन क्षेत्रों को पीछे रखने की कोशिश करते हैं और इनकी गरीबी का गाहे-बेगाहे मजाक उड़ाते रहते हैं। चिदम्बरम स्वभाव से ही इन क्षेत्रों के विरोधी हैं। इतना सत्य है कि भारत में सार्वजनिक तौर पर इन क्षेत्रों का मजाक उड़ाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। विकीलीक्स के खुलासे में उनके अंदर छिपा जहर सार्वजनिक हो गया। भारत की भौगोलिक एकता के लिए इतने जहरीले व्यक्ति का गृह मंत्री की कुर्सी पर वने रहना खतरनाक है। देश की एकता, अखण्डता किसी भारतवंशी के लिए महत्त्व का विषय है। चिदम्बरम को स्मरण दिलाने की जरूरत है कि उनके जहरीले विचार देश की एकता को चुनौती देने वाले है।


अखिल भारतीय अखंडता का विखंडन विमर्श


मनुष्य अपनी स्वभावगत मानसिकता के अनुरूप ही अपने पद का दायित्व निभा सकता है। यदि चिदम्बरम द्रमुक के उत्तर विरोधी 'द्रविड़वार' की राजनीति पर सवार होकर लोकसभा और गृहमंत्री पद तक पहुंचे हैं तो वे अपने पद का उपयोग अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उस संकीर्ण क्षेत्रवाद के सिंचन में ही करेंगे और यही वे कर रहे हैं। गृहमंत्री पद पर बैठकर भी उनकी दृष्टि में जाति, भाषा, पंथ व क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकात्मकता की भाव-भूमि तैयार कराने से अधिक अपने क्षेत्र के आर्थिक विकास की बात करना है
भारत' क्या है? यदि भारत के मानचित्र में से दक्षिणापथ को निकाल दें तो क्या 'भारत' बचेगा? यदि उसमें से उत्तरापथ को निकाल दें तो भी क्या भारत बचेगा? यहीं दो दृष्टियों का भेद आ जाता है। ब्रिटिश साम्राज्यवादी दृष्टि के प्रवक्ता सर जॉन स्ट्रेची ने 1880 में लिखा कि 'भारत को एक ईकाई मत मानो, वह तो अलग-अलग अपरिचित टुकड़ों को जोड़कर दिया गया एक नाममात्र है।' पर भारतीय राष्ट्रवाद के पुरोधा महात्मा गांधी ने इस साम्राज्यवादी दृष्टि का खंडन करते हुए 1909 में रचित अपने बीज ग्रंथ 'हिन्द स्वराज' में लिखा था, 'अंग्रेजों ने हमें सिखाया है कि हम एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में हमें सैकड़ों बरस लगेंगे। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। जब अंग्रेज हिंदुस्तान में नहीं थे तब भी हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था, तभी तो अंग्रेजों ने यहां एक राज्य कायम किया। भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होंने पैदा किए।'
गांधी के इस कथन के पीछे पूरी परम्परा खड़ी है। 1600 साल पहले विष्णु पुराण ने इस भू-सांस्कृतिक एकता की घोषणा करते हुए कहा-उत्तर यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैवदक्षिणम्। वर्ष तद्भारतं नामं, भारती यत्र संतति।। समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित है, उसका नाम भारत है और उसकी संतान या प्रजा को 'भारती' कहते हैं।
भारत के भूभाग को समझें
' इस विशाल भूखंड की भौगोलिक और सांस्कृतिक यात्रा का साक्षात्कार कब पहली बार हुआ, इसका निर्णय कर पाना आज असम्भव ही है, पर अब से 2,400 साल पहले कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस भू-सांस्कृतिक एकता के अधिष्ठान पर राजनीतिक एकता का आदर्श स्थापित हो चुका था। चक्रवर्ति क्षेत्र की सीमाओं की व्याख्या करते हुए कौटिल्य लिखते हैं,- 'देश: पृथिवी। तस्यां हिमवत्समुद्रांतर-मुदीचीनं योजना - सहस्र परियाणं तिर्यक् चक्रवर्ति क्षेत्रम्। तत्रारण्यो ग्राम्य: पार्वत औदको भौम: समो विषम इति विशेषा:।' अर्थात् 'हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र पर्यत और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में एक हजार योजन तक फैला हुआ भू-भाग चक्रवर्ति कहलाता है, उस चक्रवर्ति क्षेत्र के अंतर्गत अरण्य, ग्राम, पर्वत, जलस्रेत, ऊबड़-खाबड़ प्रदेश सभी आते हैं।' कौटिल्य कहते हैं कि इस पूरे प्रदेश को जीतकर ही चक्रवर्ती राजा बन सकता है। आसेतु हिमाचल भारत की यह भू- सांस्कृतिक एकता लोकमानस में कभी 'शकट' (बैलगाड़ी), कभी 'कूर्म' (कछुवा) और कभी 'प्रत्यंचाखिचे धनुष' जैसे प्रतीकों का रूप धारण करके उभर आती थी।
सभी की भाव भूमि पर बना देश
1857 से 1947 तक भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की भेद नीति को परास्त कर आसेतु हिमाचल राष्ट्रीय एकता के उभार का परिदृश्य लगातार उभरता रहा। अंग्रेजों ने बंगाल को तोड़ना चाहता तो उसके विरोध में पूरे भारत में स्वदेशी आंदोलन का ध्वजवाहक 'लाल-बाल-पाल' की त्रिमूर्ति बन गई। 'लाल' यानी पंजाब के लाला लाजपतराय, 'बाल' यानी महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और 'पाल' यानी बंगाल के बिपिन चन्द्र पाल। बंगाल में खुदीराम बोस फांसी के फंदे पर झूले तो पंजाब के मदनलाल ढींगरा ने शहादत का आलिंगन और सुदूर तमिलनाडु में सुब्रह्मण्यम भारती, वी.वी.एस. अय्यर और चम्पक रमण पिल्लई ने आजादी की अलख जगाई, अखिल भारतीय राष्ट्र भावना की यह भाव-भूमि मौजूद न होती तो क्या 1919 में जलियांवाला बाग नरमेध के विरुद्ध गांधी जी के आह्वान पर पूरा भारत एक साथ खड़ा हुआ होता? गांधी जी के नेतृत्व में 1920 से 1942 तक के सत्याग्रहों के माध्यम से भारत के प्रत्येक कोने में अखिल भारतीय राष्ट्रवाद की डोर से बंधा नेतृत्व उभरता?
भारतीय राष्ट्रवाद का चमत्कार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज के झंडे के नीचे भारत के प्रत्येक कोने के वीर सैनिकों ने कंधे से कंधा लगाकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी होती? उस युग में जब घोड़े और बैलगाड़ी से तेज वाहन उपलब्ध नहीं था, जब घने जंगलों, विशाल नदियों, ऊंची पहाड़ियों को पार करना सहज नहीं था और वे जनपदों की प्राकृतिक सीमाएं बन जाते थे, तब इस विशाल भूखंड में बिखरे सैकड़ों जनपदों, सहस्रें बोलियों, सहस्रें व्यवसाय आधारित जातियों को अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोकर 'भारत माता' नामक चैतन्यमय मूर्ति को आंखों के सामने खड़ा करना ही भारतीय राष्ट्रवाद का चमत्कार है। इसे इतिहास का संयोग ही कहना होगा कि 1757 से 1857 तक भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का उदय व विस्तार और भाप-बिजली से चालित यातायात व उत्पादन के यांत्रिक साधनों से सम्पन्न औद्योगिक सभ्यता का जन्म व विस्तार साथ-साथ आगे बढ़े।
विच्छिन्न करने का दुष्चक्र
टेलीग्राफ, रेल और स्टीमर जैसे त्वरित साधनों द्वारा अंग्रेजों ने इस विशाल भूखंड को प्रशासनिक एकता तो प्रदान की किंतु भारतीय राष्ट्रवाद को दुर्बल करने के लिए भारतीय समाज के वैविध्य को एकसूत्र में बांधने वाले एकता के सूत्रों को एक- एक कर विच्छिन्न करने का दुष्चक्र रचा। इस दुष्चक्र की बौद्धिक आधारशिला रखी उनकी जनगणना नीति, जाति और भाषा सव्रेक्षणों ने। उसके क्रियान्वयन का माध्यम बनी 1858 से 1935 तक भारत में आरोपित तथाकथित संविधानिक सुधार प्रक्रिया। इस संविधानिक सुधार प्रक्रिया ने देश-विभाजन की विभीषिका को जन्म दिया। स्वाधीन भारत के संविधान को 'संघवाद' और 'अल्पसंख्यकवाद' जैसी विखंडनकारी जंजीरों में जकड़ दिया। भारतीय संविधान सभा में भारतीय राष्ट्रवाद द्वारा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद जीता गया।
इस तरह दुर्बल हुआ राष्ट्रवाद
पिछले साठ वर्षो की संविधानिक यात्रा ने अखिल भारतीय राष्ट्रवाद को दुर्बल किया, जातिवाद और क्षेत्रवार की संकीर्ण निष्ठाओं को गहरा व सुदृढ़ किया है और एक ऐसा नेतृत्व ऊपर फेंका है जो इन संकीर्ण निष्ठाओं के सहारे चुनाव-प्रक्रिया के माध्यम से ऊपर उभरा है, सत्ता केंद्रों पर काबिज हुआ है। इस नेतृत्व की दृष्टि में राष्ट्र नहीं है, केवल व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा है। उसका जीवन आदर्श 'राष्ट्र के लिए दल, दल के लिए मैं' के बजाय 'राष्ट्र से बड़ा दल और दल से बड़ा 'मैं' बन गया है। जातिवाद और क्षेत्रवाद पर आश्रित सिद्धांतहीन व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा ने सामाजिक और राजनीतिक विखंडन का आज का निराशापूर्ण हृदय विदायक परिदृश्य खड़ा किया है। सत्ता के टुकड़ों के लिए मोल-तोल पर आधारित 'गठबंधन धर्म' के नाम पर इस विखंडन का समर्थन किया जा रहा है और भारतीय राष्ट्रवाद पर अधिष्ठित किसी राजनीतिक दल के अकेले के बल पर चुनाव युद्ध में विजयी होकर केंद्र का शासन चलाने की स्थिति को असम्भव माना जा रहा है।
क्षेत्रवाद, जातिवाद का पोषण
आदर्शवाद और सिद्धांतनिष्ठा से चुनाव-प्रक्रिया का कोई नाता नहीं रह गया, येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतना ही राजनीति का लक्ष्य बन गया है। स्वाभाविक ही, ऐसी राजनीति में से जो नेतृत्व उभर रहा है, वह अखिल भारतीय राष्ट्रवाद से अनुप्राणित न होकर क्षेत्रवाद और जातिवाद का पोषण कर रहा है। जरा स्मरण करें 1997 में जब संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आया तो उस सरकार के एक मंत्री पी. चिदम्बरम ने अनेक दलों की खिचड़ी सरकार की वकालत करते हुए कहा था,भारतीय राजनीति में अनेक छोटे- छोटे दलों का उदय विखंडन नहीं, भारतीय लोकतंत्र का पुष्पीकरण है। उन्हीं पी. चिदम्बरम पर आज देश के गृह मंत्री के नाते देश में आंतरिक एकता और सौहाद्र्र स्थापित कराने का गुरुतर दायित्व है।
सत्ताकांक्षी राजनीति की आवश्यकता
मनुष्य अपनी स्वभावगत मानसिकता के अनुरूप ही अपने पद का दायित्व निभा सकता है। यदि चिदम्बरम द्रमुक के उत्तर विरोधी 'द्रविड़वार' की राजनीति पर सवार होकर लोकसभा और गृहमंत्री पद तक पहुंचे हैं तो वे अपने पद का उपयोग अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उस संकीर्ण क्षेत्रवाद के सिंचन में ही करेंगे और यही वे कर रहे हैं। गृह मंत्री पद पर बैठकर भी उनकी दृष्टि में जाति, भाषा, पंथ व क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकात्मकता की भाव-भूमि तैयार कराने से अधिक अपने क्षेत्र के आर्थिक विकास की बात कराना है। आर्थिक विकास के नाम पर उत्तर विरोधी द्रविड़ भावना को उभारना उनकी व्यक्तिगत सत्ताकांक्षी राजनीति की आवश्यकता है। किंतु क्या ऐसी संकुचित, स्वार्थी राजनीति से स्वतंत्रता आंदोलन को अनुप्राणित करने वाली राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा जा सकेगा, यही भारतीय राष्ट्रवाद के सामने खड़ा यक्ष प्रश्न है।