Wednesday, April 6, 2011

अखिल भारतीय अखंडता का विखंडन विमर्श


मनुष्य अपनी स्वभावगत मानसिकता के अनुरूप ही अपने पद का दायित्व निभा सकता है। यदि चिदम्बरम द्रमुक के उत्तर विरोधी 'द्रविड़वार' की राजनीति पर सवार होकर लोकसभा और गृहमंत्री पद तक पहुंचे हैं तो वे अपने पद का उपयोग अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उस संकीर्ण क्षेत्रवाद के सिंचन में ही करेंगे और यही वे कर रहे हैं। गृहमंत्री पद पर बैठकर भी उनकी दृष्टि में जाति, भाषा, पंथ व क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकात्मकता की भाव-भूमि तैयार कराने से अधिक अपने क्षेत्र के आर्थिक विकास की बात करना है
भारत' क्या है? यदि भारत के मानचित्र में से दक्षिणापथ को निकाल दें तो क्या 'भारत' बचेगा? यदि उसमें से उत्तरापथ को निकाल दें तो भी क्या भारत बचेगा? यहीं दो दृष्टियों का भेद आ जाता है। ब्रिटिश साम्राज्यवादी दृष्टि के प्रवक्ता सर जॉन स्ट्रेची ने 1880 में लिखा कि 'भारत को एक ईकाई मत मानो, वह तो अलग-अलग अपरिचित टुकड़ों को जोड़कर दिया गया एक नाममात्र है।' पर भारतीय राष्ट्रवाद के पुरोधा महात्मा गांधी ने इस साम्राज्यवादी दृष्टि का खंडन करते हुए 1909 में रचित अपने बीज ग्रंथ 'हिन्द स्वराज' में लिखा था, 'अंग्रेजों ने हमें सिखाया है कि हम एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में हमें सैकड़ों बरस लगेंगे। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। जब अंग्रेज हिंदुस्तान में नहीं थे तब भी हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था, तभी तो अंग्रेजों ने यहां एक राज्य कायम किया। भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होंने पैदा किए।'
गांधी के इस कथन के पीछे पूरी परम्परा खड़ी है। 1600 साल पहले विष्णु पुराण ने इस भू-सांस्कृतिक एकता की घोषणा करते हुए कहा-उत्तर यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैवदक्षिणम्। वर्ष तद्भारतं नामं, भारती यत्र संतति।। समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित है, उसका नाम भारत है और उसकी संतान या प्रजा को 'भारती' कहते हैं।
भारत के भूभाग को समझें
' इस विशाल भूखंड की भौगोलिक और सांस्कृतिक यात्रा का साक्षात्कार कब पहली बार हुआ, इसका निर्णय कर पाना आज असम्भव ही है, पर अब से 2,400 साल पहले कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस भू-सांस्कृतिक एकता के अधिष्ठान पर राजनीतिक एकता का आदर्श स्थापित हो चुका था। चक्रवर्ति क्षेत्र की सीमाओं की व्याख्या करते हुए कौटिल्य लिखते हैं,- 'देश: पृथिवी। तस्यां हिमवत्समुद्रांतर-मुदीचीनं योजना - सहस्र परियाणं तिर्यक् चक्रवर्ति क्षेत्रम्। तत्रारण्यो ग्राम्य: पार्वत औदको भौम: समो विषम इति विशेषा:।' अर्थात् 'हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र पर्यत और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में एक हजार योजन तक फैला हुआ भू-भाग चक्रवर्ति कहलाता है, उस चक्रवर्ति क्षेत्र के अंतर्गत अरण्य, ग्राम, पर्वत, जलस्रेत, ऊबड़-खाबड़ प्रदेश सभी आते हैं।' कौटिल्य कहते हैं कि इस पूरे प्रदेश को जीतकर ही चक्रवर्ती राजा बन सकता है। आसेतु हिमाचल भारत की यह भू- सांस्कृतिक एकता लोकमानस में कभी 'शकट' (बैलगाड़ी), कभी 'कूर्म' (कछुवा) और कभी 'प्रत्यंचाखिचे धनुष' जैसे प्रतीकों का रूप धारण करके उभर आती थी।
सभी की भाव भूमि पर बना देश
1857 से 1947 तक भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की भेद नीति को परास्त कर आसेतु हिमाचल राष्ट्रीय एकता के उभार का परिदृश्य लगातार उभरता रहा। अंग्रेजों ने बंगाल को तोड़ना चाहता तो उसके विरोध में पूरे भारत में स्वदेशी आंदोलन का ध्वजवाहक 'लाल-बाल-पाल' की त्रिमूर्ति बन गई। 'लाल' यानी पंजाब के लाला लाजपतराय, 'बाल' यानी महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और 'पाल' यानी बंगाल के बिपिन चन्द्र पाल। बंगाल में खुदीराम बोस फांसी के फंदे पर झूले तो पंजाब के मदनलाल ढींगरा ने शहादत का आलिंगन और सुदूर तमिलनाडु में सुब्रह्मण्यम भारती, वी.वी.एस. अय्यर और चम्पक रमण पिल्लई ने आजादी की अलख जगाई, अखिल भारतीय राष्ट्र भावना की यह भाव-भूमि मौजूद न होती तो क्या 1919 में जलियांवाला बाग नरमेध के विरुद्ध गांधी जी के आह्वान पर पूरा भारत एक साथ खड़ा हुआ होता? गांधी जी के नेतृत्व में 1920 से 1942 तक के सत्याग्रहों के माध्यम से भारत के प्रत्येक कोने में अखिल भारतीय राष्ट्रवाद की डोर से बंधा नेतृत्व उभरता?
भारतीय राष्ट्रवाद का चमत्कार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज के झंडे के नीचे भारत के प्रत्येक कोने के वीर सैनिकों ने कंधे से कंधा लगाकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी होती? उस युग में जब घोड़े और बैलगाड़ी से तेज वाहन उपलब्ध नहीं था, जब घने जंगलों, विशाल नदियों, ऊंची पहाड़ियों को पार करना सहज नहीं था और वे जनपदों की प्राकृतिक सीमाएं बन जाते थे, तब इस विशाल भूखंड में बिखरे सैकड़ों जनपदों, सहस्रें बोलियों, सहस्रें व्यवसाय आधारित जातियों को अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोकर 'भारत माता' नामक चैतन्यमय मूर्ति को आंखों के सामने खड़ा करना ही भारतीय राष्ट्रवाद का चमत्कार है। इसे इतिहास का संयोग ही कहना होगा कि 1757 से 1857 तक भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का उदय व विस्तार और भाप-बिजली से चालित यातायात व उत्पादन के यांत्रिक साधनों से सम्पन्न औद्योगिक सभ्यता का जन्म व विस्तार साथ-साथ आगे बढ़े।
विच्छिन्न करने का दुष्चक्र
टेलीग्राफ, रेल और स्टीमर जैसे त्वरित साधनों द्वारा अंग्रेजों ने इस विशाल भूखंड को प्रशासनिक एकता तो प्रदान की किंतु भारतीय राष्ट्रवाद को दुर्बल करने के लिए भारतीय समाज के वैविध्य को एकसूत्र में बांधने वाले एकता के सूत्रों को एक- एक कर विच्छिन्न करने का दुष्चक्र रचा। इस दुष्चक्र की बौद्धिक आधारशिला रखी उनकी जनगणना नीति, जाति और भाषा सव्रेक्षणों ने। उसके क्रियान्वयन का माध्यम बनी 1858 से 1935 तक भारत में आरोपित तथाकथित संविधानिक सुधार प्रक्रिया। इस संविधानिक सुधार प्रक्रिया ने देश-विभाजन की विभीषिका को जन्म दिया। स्वाधीन भारत के संविधान को 'संघवाद' और 'अल्पसंख्यकवाद' जैसी विखंडनकारी जंजीरों में जकड़ दिया। भारतीय संविधान सभा में भारतीय राष्ट्रवाद द्वारा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद जीता गया।
इस तरह दुर्बल हुआ राष्ट्रवाद
पिछले साठ वर्षो की संविधानिक यात्रा ने अखिल भारतीय राष्ट्रवाद को दुर्बल किया, जातिवाद और क्षेत्रवार की संकीर्ण निष्ठाओं को गहरा व सुदृढ़ किया है और एक ऐसा नेतृत्व ऊपर फेंका है जो इन संकीर्ण निष्ठाओं के सहारे चुनाव-प्रक्रिया के माध्यम से ऊपर उभरा है, सत्ता केंद्रों पर काबिज हुआ है। इस नेतृत्व की दृष्टि में राष्ट्र नहीं है, केवल व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा है। उसका जीवन आदर्श 'राष्ट्र के लिए दल, दल के लिए मैं' के बजाय 'राष्ट्र से बड़ा दल और दल से बड़ा 'मैं' बन गया है। जातिवाद और क्षेत्रवाद पर आश्रित सिद्धांतहीन व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा ने सामाजिक और राजनीतिक विखंडन का आज का निराशापूर्ण हृदय विदायक परिदृश्य खड़ा किया है। सत्ता के टुकड़ों के लिए मोल-तोल पर आधारित 'गठबंधन धर्म' के नाम पर इस विखंडन का समर्थन किया जा रहा है और भारतीय राष्ट्रवाद पर अधिष्ठित किसी राजनीतिक दल के अकेले के बल पर चुनाव युद्ध में विजयी होकर केंद्र का शासन चलाने की स्थिति को असम्भव माना जा रहा है।
क्षेत्रवाद, जातिवाद का पोषण
आदर्शवाद और सिद्धांतनिष्ठा से चुनाव-प्रक्रिया का कोई नाता नहीं रह गया, येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतना ही राजनीति का लक्ष्य बन गया है। स्वाभाविक ही, ऐसी राजनीति में से जो नेतृत्व उभर रहा है, वह अखिल भारतीय राष्ट्रवाद से अनुप्राणित न होकर क्षेत्रवाद और जातिवाद का पोषण कर रहा है। जरा स्मरण करें 1997 में जब संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आया तो उस सरकार के एक मंत्री पी. चिदम्बरम ने अनेक दलों की खिचड़ी सरकार की वकालत करते हुए कहा था,भारतीय राजनीति में अनेक छोटे- छोटे दलों का उदय विखंडन नहीं, भारतीय लोकतंत्र का पुष्पीकरण है। उन्हीं पी. चिदम्बरम पर आज देश के गृह मंत्री के नाते देश में आंतरिक एकता और सौहाद्र्र स्थापित कराने का गुरुतर दायित्व है।
सत्ताकांक्षी राजनीति की आवश्यकता
मनुष्य अपनी स्वभावगत मानसिकता के अनुरूप ही अपने पद का दायित्व निभा सकता है। यदि चिदम्बरम द्रमुक के उत्तर विरोधी 'द्रविड़वार' की राजनीति पर सवार होकर लोकसभा और गृहमंत्री पद तक पहुंचे हैं तो वे अपने पद का उपयोग अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उस संकीर्ण क्षेत्रवाद के सिंचन में ही करेंगे और यही वे कर रहे हैं। गृह मंत्री पद पर बैठकर भी उनकी दृष्टि में जाति, भाषा, पंथ व क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकात्मकता की भाव-भूमि तैयार कराने से अधिक अपने क्षेत्र के आर्थिक विकास की बात कराना है। आर्थिक विकास के नाम पर उत्तर विरोधी द्रविड़ भावना को उभारना उनकी व्यक्तिगत सत्ताकांक्षी राजनीति की आवश्यकता है। किंतु क्या ऐसी संकुचित, स्वार्थी राजनीति से स्वतंत्रता आंदोलन को अनुप्राणित करने वाली राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा जा सकेगा, यही भारतीय राष्ट्रवाद के सामने खड़ा यक्ष प्रश्न है।

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