Wednesday, April 6, 2011

देश की एकता को चुनौती देते जहरीले विचार


चिदम्बरम स्वभाव से ही उत्तर-पू र्व क्षेत्रों के विरो धी हैं। देश में सार्वजनिक तौर पर इन क्षेत्रों का मजाक उड़ाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। अब उनके अंदर छिपा जहर सार्वजनिक हो गया है। भारत की भौगोलिक एकता के लिए इतने जहरीले व्यक्ति का गृहमंत्री की कुर्सी पर बना रहना खतरनाक है। देश की एकता, अखण्डता किसी भारतवंशी के लिए महत्व का विषय है। चिदम्बरम को स्मरण दिलाने की जरूरत है कि उनके जहरीले विचार देश की एकता को चुनौती देने वाले हैं
गृह मंत्री पी. चिदम्बरम राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति दुराग्रह का भाव रखते हैं, ऐसा मेरा शुरू से मानना है। उन्हें मैंने 1991 के बाद से आने वाली सभी सरकारों में मंत्री के रूप में देखा है। कभी एक शब्द हिंदी में बोलते मैंने नहीं सुना। एच.डी. देवगौड़ा 1996 में प्रधानमंत्री थे। उन्होंने फैसला किया कि राष्ट्र के नाम सम्बोधन हिंदी में ही करेंगे। उन्होंने अपने वचन का पालन किया। उनके वित्त मंत्री के रूप में चिदम्बरम ने काम किया लेकिन अपने प्रधानमंत्री की घोषणाओं का उन पर प्रभाव नहीं पड़ा। गृह मंत्री ने अपने अंदर पलने वाले जहर का खुलासा अमेरिकी राजनयिक के सामने कर दिया। अपने राज नेताओं की खूबी है कि वे देश की जनभावना का ध्यान कम रखते हैं। वे अमेरिकी अंग्रेजी प्रभुओं को खुश रखने में अपने सफल राजनीतिक जीवन का रहस्य ढूंढते हैं। अंग्रेजी विश्वविद्यालयों में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अंग्रेजी भाषा को अंग्रेजी राज की सर्वश्रेष्ठ देन घोषित करते हैं। चिदम्बरम तमिलनाडु का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। उस राज्य का जनमानस हिंदी के खिलाफ है। उसका प्रभाव गृह मंत्री के व्यक्तित्व पर रहता है।
हिंदी राज्यों के बिना अकल्पनीय है भारत
उन्हें भारत की आर्थिक तरक्की की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि देश के भूगोल में हिंदी बहुल अथवा उत्तर भारत के कुछ राज्य नहीं होते तो हमारी तरक्की की रफ्तार बढ़ जाती। यह उनकी अज्ञानता का सबसे बड़ा सबूत है। हिंदी बहुल राज्यों को अलग कर क्या भारत नाम की कल्पना की जा सकती है? भारत के शरीर से आत्मा को अलग कर शरीर की कल्पना की जा सकती है। देश के तटवर्त्ती राज्यों की तरक्की के ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण रहे हैं। करीब छ: सौ साल पहले पुर्तगाली नाविक वास्को डिगामा कालीकट आया था। दक्षिण भारत से यूरोप के जलमार्ग के सबसे नजदीक के रास्ते की उसने तलाश की उसके बाद से भारतीय उत्पादों की धूम यूरोपीय बाजारों में हो गई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है उत्तर की
दक्षिण भारत में जिन यूरोपीय देशों ने धावा वोला, उनका मूल उद्देश्य अपने व्यापार को बढ़ाना था। उत्तर भारत में 1200 वर्ष पहले से खैबर वोलन के रास्ते यूनान, समरकंद, मंगोलिया आदि देशों के आक्रमणकारी आते रहे। उनका उद्देश्य भारत की सम्पदा को लूटकर अपने देश वापस जाना था। केवल मुगलों का खानदान भारत में टिका और 300 वर्षो तक का भारतीय इतिहास उनके शासन का काल माना जा सकता है। उन्होंने अपने शासन में कला साहित्य, संगीत के क्षेत्र में योगदान अवश्य किया किंतु उनका शासनकाल आंतरिक विद्रोह को दबाने के नाम पर दमन और लूट का भी कार्यकाल है। अंग्रेजी सरकार ने तो 1857 से 1942 तक अपने साम्राज्य की सारी शक्ति इन्हीं क्षेत्रों के दमन में लगा दिया। अंग्रेजी राज के खिलाफ जनविद्रोह का लम्बा अध्याय हृदय प्रदेशों में लिखा गया। जितना उग्र विद्रोह उतना ही क्रूर दमन; 1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजी पलटन ने गंगा, जमुना, घाघरा के जलमार्ग को चुना और इन्हीं क्षेत्रों के सुदूर गांवों और इलाकों में हजारों की संख्या में निदरेष जनता मारी गई। मुगल दौर में भी पलटन को आसानी से पहुंचाने के लिए जलमार्ग का ही इस्तेमाल होता था। इसलिए गंगा, जमुना, घाघरा का मैदान दमन क्षेत्र था, जहां के गांव के गांव और कस्बे लूटे-उजाड़े गए। 1942 का संग्राम भी इन्हीं क्षेत्रों में लड़ा गया।
विदेशी जुल्म से कभी नहीं भिड़े तटीय राज्य
तटीय राज्यों ने विदेशी जुल्म के खिलाफ कभी बगावत नहीं की। 1942 के अंतिम विद्रोह में उनकी साझीदारी नाम मात्र की थी। उन क्षेत्रों में नाव से यातायात के सुगम रास्तों की जानकारी थी। वहां के जलमागरे का उपयोग व्यावसायिक और व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया गया। उत्तर भारत के दुर्गम र्दे और जलमार्ग इन क्षेत्रों को लूट और दमन के माध्यम थे। स्वाभाविक था हुकूमत करने वालों ने इन क्षेत्रों को हीनता की नजर से देखते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देना तो दूर व्यापार और उद्योग के सभी साधनों को नष्ट करने में अपनी शक्ति लगा दी। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति होने से पहले बंगाल, बिहार के सुदूर क्षेत्रों में हाथ से तैयार कपड़े की खपत ब्रिटेन और यूरोप खाड़ी के देशों में बड़ी मात्रा में होती थी। मशीन से तैयार ब्रिटिश कपड़े की खपत को बढ़ाने के लिए इन क्षेत्रों में होने वाले कपड़े के उत्पादों पर आक्रमण किए। करघे बंद कराए गए।
औपनिवेशिक जकड़न
ढाका के आसपास मलमल तैयार करने वाले कारीगरों के अंगूठे काट लेने के फरमान जारी किए गए। बड़े महानगर जिन्हें अंग्रेजों ने बसाया था। सूरत और मुम्बई के इर्द-गिर्द आधुनिक कपड़े की मिलें खोली गई। बिहार, बंगाल के सुदूर ग्रामीण इलाकों में पटसन से तैयार होने वाले बोरे बनाने की पद्धति को तोड़कर चटकल मिलें कलकत्ता में बनाई गई जहां ग्रामीण क्षेत्रों में भुखमरी के शिकार लोग इन महानगरों में रोजी तलाशने के लिए विवश हुए। तटीय राज्यों के लोग समुद्री मार्ग से यूरोप, अफ्रीका के देशों में बड़ी संख्या में व्यवसाय व ऊंची पढ़ाई के लिए जाने लगे। उत्तरी हिंदुस्तान के गरीब निरक्षर लोगों को ठेके पर मजदूर बनाकर यूरोपीय कॉलोनियों में खेती में काम करने के लिए जबरन बसाया गया। डच, अंग्रेज, पुर्तगाली शासक व्रिटिश गुयाना, मॉरिशस, ट्रिनिडाड आदि टापुओं में जंगल-झाड़ में ले जाकर पटक दिए। उन्हें मजबूरन वहां श्रम देकर आधी-अधूरी कमाई से अपना काम चलाना था।
दमन और लूट उत्तर ने ही झेला
चूंकि तटीय राज्यों में अंग्रेजी जानने वालों की फौज जल्द तैयार हुई। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं, निम्न शहरी धंधों, घरेलू साफ-सफाई के काम में अच्छे वेतन पर तटीय राज्यों के प्रवासी भारतीय लगाए गए। उनके माध्यम से मसाले, चाय, चीनी के उत्पाद यूरोपीय देशों के लोगों की पसंद बने। जलमार्ग ही व्यापार का एक मात्र साधन था जिससे सम्पदा का अर्जन इन क्षेत्रों ने किया। उत्तरी भारत दमन और लूट के कारण शोषण और पिछड़ेपन का शिकार होता रहा। चिदम्बरम को भारत की तरक्की और पिछड़ेपन के कारकों में भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों की समीक्षा का न तो आधार है न ही इन क्षेत्रों के इतिहास का ज्ञान है। इसलिए उनकी टिप्पणी पूर्वाग्रह ग्रस्त अज्ञानतापूर्ण अभिव्यक्ति ही मानी जा सकती है।
हिंदी के विरुद्ध षड्यंत्र
आजादी के बाद से सत्ता प्रतिष्ठानों से इन क्षेत्रों की जनभाषा हिंदी हमेशा षड्यंत्र द्वारा दूर की गई। न्याय, कानून, व्यापार, प्रशासन आदि सभी स्तरों से हिंदी का भोजन अंग्रेजी करती जा रही है। जिसके कारण सभी हिंदीभाषी राज्य भाषायी गुलामी के शिकार हुए। आजाद भारत में भी व्यापार अैर उद्योग की सम्पूर्ण भाषा अंग्रेजी हो गई। तरक्की के मुख्य दरवाजों से हिंदी खदेड़ दी गई। गृह मंत्रालय के जिम्मे संसद ने राजभाषा के पद पर हिंदी को प्रतिष्ठित कराने का काम सौंपा। चिदम्बरम के गृह मंत्रालय में आते पूरा मंत्रालय अंग्रेजी समर्थकों का अड्डा वन गया। राजभाषा समारोहों में भी गृह मंत्री और उनके अधिकारी अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं।
पिछड़े पन की जड़ में भाषायी गुलामी
आर्थिक औद्योगिक क्षेत्र में इन इलाकों के पिछड़ेपन की जड़ में भाषायी गुलामी है। उच्चशिक्षा ,चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधकीय ज्ञान का क्षेत्र अंग्रेजी के कब्जे में हो गया। अखिल भारतीय सेवाओं से पुन: हिन्दी निर्वासित कर दी गई। हिंदी क्षेत्रों के पिछड़ेपन के बुनियादी कारणों में इन क्षेत्रों का विद्रोही स्वभाव है। आजाद भारत के भी विद्रोह चाहे 1967, 1977, 1989 में हुए सभी का दायरा उत्तरी- मध्य भारत का इलाका था इसलिए षड्यंत्र रचकर दिल्ली के राजकर्ता इन क्षेत्रों को पीछे रखने की कोशिश करते हैं और इनकी गरीबी का गाहे-बेगाहे मजाक उड़ाते रहते हैं। चिदम्बरम स्वभाव से ही इन क्षेत्रों के विरोधी हैं। इतना सत्य है कि भारत में सार्वजनिक तौर पर इन क्षेत्रों का मजाक उड़ाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। विकीलीक्स के खुलासे में उनके अंदर छिपा जहर सार्वजनिक हो गया। भारत की भौगोलिक एकता के लिए इतने जहरीले व्यक्ति का गृह मंत्री की कुर्सी पर वने रहना खतरनाक है। देश की एकता, अखण्डता किसी भारतवंशी के लिए महत्त्व का विषय है। चिदम्बरम को स्मरण दिलाने की जरूरत है कि उनके जहरीले विचार देश की एकता को चुनौती देने वाले है।


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