कश्मीर की फिजां में बदलाव नजर आने लगा है। कुछ महीने पहले तक हताश-निराश नजर आने वाले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अब आक्रामक मुद्रा में हैं। नौजवान अब्दुल्ला में यह नया आत्म-विश्वास केंद्र तथा खुद उनकी सरकार द्वारा उठाए गए रचनात्मक कदमों की वजह से आया है। इनकी शुरुआत मध्यस्थों और संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के दौरों, घाटी के लिए विकास पैकेज की घोषणा, जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेना में कश्मीरियों की भरती फिर से शुरू करने, बड़े कस्बों से सुरक्षा बलों की मौजूदगी को कम करने और सबसे महत्वपूर्ण नए कोर कमांडर के नेतृत्व में सेना द्वारा दिल के हथियार की रणनीति अपनाने से हुई है। संयोग से, नए कोर कमांडर, धरती के सपूत भी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अलगाववादियों को निष्कि्रय कर देने और उनके आपसी झगड़ों व मतभेदों के चलते कट्टरपंथी गिलानी को झटका लगा है और उन्हें यह घोषित करने पर मजबूर होना पड़ा है कि इन गरमियों में उनका विरोध-प्रदर्शनों का कोई इरादा नहीं है। लगता है उनकी समझ में आ गया है कि लोगों ने टकराव की उनकी नीति को ठुकरा दिया है, जिससे जनता को दुख-तकलीफों के सिवा और कुछ नहीं मिला है। सरकार के सुलह के प्रयास प्रदेश में शांति की स्थापना में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं। अगर अलगाववादियों ने यह मौका गंवा दिया तो कश्मीर समस्या के किसी भी भावी समाधान के लिए बातचीत से बाहर रहने के लिए जिम्मेदार वे खुद ही होंगे। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के नाकाम प्रयासों के बाद वे भी समझ गए हैं कि इस मुद्दे को एक राजनीतिक समस्या मानने और अपने क्षेत्र के लोगों को राजनीतिक स्तर पर बातचीत के लिए राजी करने से ही समस्या का समाधान निकल सकता है। अब हर कोई समझता है कि राज्य के विकास के लिए आर्थिक पैकेज बहुत जरूरी हैं। फिर भी कुछ साहसिक फैसले लेने जरूरी हंै। ऐसी पहलों के लिए अनुकूल माहौल पहली जरूरत है। सरकार के कटु आलोचक भी मानते हैं कि राज्य के लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति एक बड़ा कदम थी। इससे विभिन्न पक्षों के बीच संवादहीनता की स्थिति खत्म हुई है। एएफएसपीए को आंशिक रूप से वापस लेने, सैनिकों की संख्या में कमी के लिए अलगाववादियों के शोर-शराबे जैसी समस्याओं से बाद में निपटा जा सकता है। उमर अब्दुल्ला का हाल का एक और बयान भी स्वागत-योग्य है कि कश्मीरी पंडितों को वापस कश्मीर घाटी में बुलाने के एक बहु-आयामी कार्यक्रम पर उनकी सरकार काम कर रही है। हाल के महीनों में जमीनी स्थिति में सुधार को देखते हुए पंडितों को आश्वस्त करने का यही समय है। घाटी में शांति प्रक्रिया के लिए अगले कुछ महीने बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह समय है जब बर्फ पिघलती है, दर्रे खुलते हैं और सीमा पार से घुसपैठ शुरू होती है। साथ ही अमरनाथ यात्रा भी शुरू हो जाती है। पिछली चार गर्मियों से यही देखने में आया है कि इन सबके चलते माहौल खराब हो जाता है। मध्यस्थ जल्दी ही अपने निष्कर्ष केंद्र को सौंपेंगे। यह तो तय है कि वे विकास के पैकेज की सिफारिश करेंगे। इसके साथ ही गुमराह कश्मीरियों का मन जीतने के लिए दिल की रणनीति भी अपनाई जाएगी। अब अलगाववादियों को वार्ता में शामिल करने से ही तस्वीर पूरी हो पाएगी। अलगाववादियों को खुले दिमाग से फैसले लेने होंगे। इस प्रकार वे इतिहास में अपनी जगह सुरक्षित कर सकेंगे। इस बार जनता इच्छुक है, केंद्र सहयोग को तैयार है और राज्य सरकार प्रक्रिया को तार्किक परिणति तक पहुंचाने की इच्छुक है। फिलहाल गेंद गिलानी के पाले में है। देखते हैं, वे कौन सा खेल खेलते हैं। जो भी हो, इतिहास बनने जा रहा है! इस बीच घाटी, दम साधे इंतजार कर रही है!
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