Monday, July 18, 2011

एक नजर में गोरखालैंड आंदोलन

: इस वर्ष में भी अलग राज्य की मांग उठी, लेकिन तब हिल्स की गोरखाओं की कुल आबादी महज 10 हजार थी, लिहाजा आवाज दबी रह गई। वर्ष 1907 : दार्जिलिंग का मसला शुरू से ही अटकटा रहा है। 1907 में बंगाल-बिहार के बंटवारे के बाद दार्जिलिंग का भू-भाग भागलपुर कमिश्नरी के अधिकार क्षेत्र में पड़ा। उसी वक्त हिल्स के लोगों ने अपने लिए अलग प्रशासनिक अधिकार का मांग पत्र सौंपा और इसी प्रक्रिया के बाद कर्सियांग और सिलीगुड़ी को नगर निगम का दर्जा मिला। वर्ष 1917 : कहा जाता है कि अलग राज्य की मांग इसी वर्ष पहली बार उठी। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया एडविन मोंटेग्यू को हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से एक आवेदन के तहत दार्जिलिंग, डुवार्स, असम और नेफा (अरूणांचल प्रदेश) को लेकर नार्थ ईस्ट फ्रंटियर के रूप में अलग राज्य की मांग की गई। वर्ष 1920 : भारतीय संविधान में नौंवे संशोधन के तहत दार्जिलिंग को बैकवर्ड ट्रैक्ट बताया गया जिसे हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से अस्वीकार कर दिया गया। तराई के लोगों के शासन को नकारते हुए एसोसिएशन की ओर से अलग मांग पत्र रखा गया। इसी वर्ष अलग दार्जिलिंग एवं तराई को मिलाकार अलग राज्य की मांग करने वाले हिलमेंस एसोसिएशन को इस बार अंग्रेजी सदस्यता वाली दार्जिलिंग प्लांटर्स एसोसिएशन एवं यूरोपियन एसोसिएशन ऑफ दार्जिलिंग का भी सहयोग प्राप्त हुआ। वर्ष 1929 : इंग्लैंड से इंडिया के दौरे पर आए साइमन कमीशन के समक्ष हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से एक बार फिर अलग राज्य की मांग उठाई गई। इसी साल झारखंड राज्य की भी मांग उठी और यहां के लोगों को और बल मिला। वर्ष 1934 : स्वशासन की पिछली सभी मांगे अस्वीकृत होने के बाद छह अगस्त को एस डब्ल्यू लादेन ला, लेफ्टिनेंट गोब‌र्द्धन गुरुंग और मदन थापा की अगुवाई में हिल्स एसोसिएशन ने सेक्रेटरी फार इंडिया सैमुअल को एक बार फिर अपनी मांग के साथ आवेदन पत्र सौंपा। वर्ष 1935 : हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से रूपनरायण सिन्हा ने 1915 एक्ट का विरोध करते हुए पहली बार आंदोलन को नाम देते हुए होमलैंड की मांग उठाई। वर्ष 1937 : कलिम्पोंग हिलमेंस एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राय प्रसाद हरि प्रसाद प्रधान ने प्रत्यक्ष तौर पर सरकार हिल्स को बंगाल से अलग करने की अपील की। वर्ष 1941 : अब तक लोगों को समझ में आ गया था कि मात्र मांग पत्र सौंपने से कुछ नहीं होने वाला है। इसी के बाद राजनीतिक स्तर पर सक्रियता बढ़ाई गई। 1943 में डम्बर सिंह गुरुंग ने ऑल इंडिया गोरखालीग की स्थापना की। वर्ष 1944 : यह सरकारी तौर पर की गई मांग नहीं थी। दरअसल महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना दार्जिलिंग आए हुए थे। गोरखाओं के प्रतिनिधियों ने दोनों नेताओं से मिलकर स्वशासन की पुरानी मांग उठाई। 1945 में सीपीआइ ने गोरखालीग से अपनी संबंध तोड़ लिया और अलग राज्य का नाम रख कर गोरखास्थान आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया। वर्ष 1947 : सीपीआइ की दार्जिलिंग जिला इकाई ने भारत के अंतरिम सरकार के उप राष्ट्रपति जवाहर लाल नेहरु और वित्त मंत्री लियाकत अली खान से गोरखास्थान बनाए जाने की मांग की। इसी दौरान गोरखा बनाम नेपाली समुदाय के बहाने विवाद उत्पन्न करने की कोशिश की गई। कुछ साल के भीतर विवाद यह कहते हुए साफ कर दिया गया कि गोरखा जाति है और नेपाली भाषा। वर्ष 1948 : डम्बरसिंह गुरुंग की मौत के बाद नरबहादुर गुरुंग ने ऑल इंडिया गोरखालीग की कमान संभाली। गोरखास्थान के लिए प्रधानमंत्री नेहरु को पत्र लिख कर तीन विकल्प सुझाए। इसमें केंद्र सरकार के अधीन अलग प्रशासनिक इकाई या दार्जिलिंग और पड़ोसी इलाकों को लेकर एक अलग प्रान्त या दार्जिलिंग, डुआर्स और असम को मिलाकर स्वशासी प्रदेश मांग रखी गई। वर्ष 1949 : दार्जिलिंग, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और सिक्किम के कई नेता दार्जिलिंग में जुटे उन लोगों ने उत्तर खंड प्रदेश संघ नामक संगठन के निर्माण की घोषणा की। दिल्ली जाकर तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से संघ के नेताओं ने जाकर मुलाकात की। 1949 : सिक्किम दौरे पर आए विदेश मंत्री के समक्ष गोरखा नेताओं ने एक बार फिर गोरखास्थान की मांग उठाई। वर्ष 1952 : प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार नेहरु दार्जिलिंग आए थे। कलिम्पोंग में ग्राहम हाउस देखने के बाद गोरखालीग ने उनसे नार्थ ईस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स की मांग की। वर्ष 1955 : दार्जिलिंग दौरे पर राज्य पुर्नगठन समिति के अध्यक्ष के सामने श्रमिक संघ ने अलग राज्य के लिए अपने तर्क पेश किए। वर्ष 1955 : आज तक छोटे छोटे संगठन सामूहिक तौर पर अलग राज्य की मांग कर रहे थे पहली बार ऑल कमेटी डिस्टि्रक आर्गेनाइजेशन के बैनर तले सामूहिक रूप से अलग राज्य का तर्क पेश किया। वर्ष 1980 : गोरखालीग के बाद प्रान्त मोर्चा ने गोरखालैंड के लिए आंदोलन को गति दी। अपने हजारों समर्थकों की अपील पर मोर्चा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को टेलीग्राम कर अलग राज्य की मांग की। उन्हें विश्वास दिलाया गया कि गोरखालैंड अस्तित्व में आने के बाद भी भारत का ही अंग रहेगा। वर्ष 1982 : गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट के पक्ष में जनसमर्थन के मद्देनजर प्रांत परिषद के अध्यक्ष इंद्रबहादुर राय ने जनवरी में गृहमंत्री ज्ञानी सिंह को पक्ष लिखकर दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को मिलाकर गोरखालैंड बनाने की मांग की। वर्ष 1986 : सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिब्ररेशन फ्रंट में पढ़े लिखे लोगों को बहुत कम जगह दी गई और इसके बाद ही स्टडी फोरम का गठन किया गया। घीसिंग के उग्र आंदोलन के बाद आखिरकार दागोपाप का गठन हुआ और कुछ वर्षो तक स्थिति शांत रही लेकिन पहाड़ देश से अलग होता चला गया और विकास से कोषों दूर। इसके बाद वर्ष वर्ष 2004 में विमल गुरुंग का उदय हुआ और उन्होंने अलग पार्टी बनाकर आंदोलन को आगे ले जाने का बीड़ा उठाया।
107 साल के बाद
हिल्स के लोगों के लिए सोमवार का दिन सबसे महत्वपूर्ण रहेगा। इसका सिर्फ एक कारण त्रिपक्षीय वार्ता ही नहीं बल्कि कई कारण होंगे। कई वर्षो बाद यहां के लोगों में विकास की उम्मीद जगी है। शिक्षा, चिकित्सा, सुविधाओं, पर्यटन के विकास की बात हो रही है। इससे लोगों में उत्साह का संचार हुआ है और नजरिया भी बदला है। अब हर बात पर आंदोलन नहीं बल्कि इसे रोकने की बात की जा रही है। यही वजह था कि पिछले दिनों फिल्म निर्देशक अनुराग बासु की फिल्म की शूटिंग के दौरान गोजमुमो कार्यकर्ता उनके साथ खड़े रहे। बात-बात पर आंदोलन करने वाले गोजमुमो कार्यकर्ता अब विकास की बातें कर रहे हैं और अन्य स्थानीय दलों से भी इसमें सहयोग मांग रहे हैं। जादुई फार्मूले का असर दिखाई देने लगा है। तकरीबन 107 वर्ष के बाद गोरखालैंड नाम को मान्यता मिल गई है। इसे लेकर हिल्स के लोगों आंदोलन के बजाय अब विकास के लिए बहस शुरू हो गई है। लोग गली और सड़कों पर खड़े होकर कहते हैं कि अलग राज्य नहीं, लेकिन गोरखालैंड का नाम मिल गया। चाहे जो हो माना जा रहा है कि त्रिपक्षीय वार्ता के बाद नई व्यवस्था के लागू होने से विकास कार्यो को गति मिलेगी और हिल्स के प्रति लोगों की मानसिकता भी बदलेगी। सही मायने में देखा जाए तो इस समय पहाड़ में नई राजनीति करवट ले रही है और विकास का भी उदय हो रहा है। प्रदेश की मुखिया ने सभी दलों को नई व्यवस्था में सहयोग देने की अपील की है और पहाड़ को आगे बढ़ाने के लिए हाथ बढ़ाने को कहा है। ऐसे में सावन का पहला सोमवार लोगों के लिए कई सौगातें लेकर आएगा। समय बदला है। अतीत के आइने में देखें तो आंदोलन और बंदी के कारण कई लोगों की जानें गई व करोड़ों का नुकसान हुआ। बीते कई वर्षो से पहाड़ में तो यही देखने को मिला और अलग राज्य गोरखालैंड के लिए आंदोलन भी थमने का नाम नहीं ले रहे थे। इसको रोकने को लेकर केंद्र व वाम शासन काल में गोजमुमो प्रतिनिधिमंडल की कई चक्र वार्ताएं हुई, लेकिन सभी बेनतीजा रही। गोजमुमो ने अपनी मांग मनवाने के लिए कई बार पहाड़ बंद आंदोलन किया। इसके तहत पहाड़ के सभी सरकारी व गैर सरकारी कार्यालय भी बंद कराए। आंदोलन कई बार इतना तेज हुआ, जिससे पहाड़ का जनजीवन भी प्रभावित हुआ। इसके बाद फिर अघोषित काल के लिए दुकानों के शटर गिर गए, वाहनों के पहिए थमने, पर्यटकों के पलायन का सिलसिला अनवरत जारी रहा। करोड़ों का व्यापार प्रभावित हुआ और हिल्स को आंदोलन का केंद्र मान लिया गया। ऐसे में विधानसभा चुनाव ने हिल्स में अलग ही स्फूर्ति भर दी। परिणाम घोषित हुए और बंगाल में 34 वर्षो से जल रही लाल बत्ती बुझ गई। लोगों ने कहा बंगाल को ग्रीन सिग्नल मिल गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुर्सी पर आई और अपने वादे पहाड़ को स्विट्जरलैंड बनाने की मुहिम के तहत उन्होंने पहाड़ क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श करना शुरू कर दिया। वार्ता का परिणाम भी सार्थक रहा और मंत्रियों ने मुखिया के निर्देश पर पहाड़ का दौरा किया। ऐसे में ममता सरकार द्वारा की जा रही पहल से पहाड़वासियों में भी आशा की किरण जगना स्वाभाविक है। गोजमुमो व राज्य की नई सरकार के बीच जो नए रिश्ते उभर रहे हैं उससे पहाड़ की विपक्षी पार्टियां भौचक्क हैं। यह दीगर है कि सभी ने एक साथ प्रदेश सरकार व गोजमुमो की वार्ता को असफल बताने के लिए एक के बाद एक बयान दिये। शुरू हुई बदलाव की बयार : हिल्स इस समय बदलाव चाहता है। गोजमुमो नेताओं का कहना है कि यह समय की मांग है, लेकिन यह कहने से गुरेज नहीं कि अलग राज्य का गठन गोरखाओं की अस्मिता से जुड़ा है और इसकी मांग जारी रहेगी। पिछले दिनों मोर्चा के प्रतिनिधिमंडल की कोलकाता, दिल्ली में केंद्रीय नेताओं से वार्ता हुई। इसके बाद कई निर्णय हुए। नतीजे के अनुसार चाय बागानों में कार्यरत श्रमिकों को स्थायी करने के लिए मानक बनाए गए। उनकों सुविधाएं मुहैया कराने पर भी मुहर लगाई गई। प्रदेश की मुखिया ममता बनर्जी के निर्देश के बाद आनन-फानन में कई मंत्रियों ने पहाड़ का दौरा किया। सभी ने स्वीकार किया कि वह मुख्यमंत्री के निर्देश पर आए और अपने दौरे की रिपोर्ट वह ममता बनर्जी को देंगे। मुख्यमंत्री रिपोर्ट के अनुसार आगे की रूप-रेखा तैयार करेंगी। आने वाले दिनों में त्रिपक्षीय वार्ता के बाद विकास के रास्ते खुलने की उम्मीद है। मूलभूत समस्याएं : मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहाड़ की सभी समस्याओं से पिछले दिनों गोजमुमो के प्रतिनिधिमंडल ने अवगत कराया। इसके बाद उन्होंने यहां की मूलभूत समस्याओं को दूर करने के बाबत घोषणा की। इसमें पुरानी योजनाओं को लागू व इसे क्रियान्वित कराने में तेजी लाना भी शामिल है। इसके अलावा रोजगार व पर्यटन के दृष्टि से भी कई कदम उठाने की बात की। इसके तहत कई कदम भी उठाए और पैकेज की घोषणा की। विकास की संभावनाएं : ऐसा कई दिनों बाद हुआ जब प्रदेश के कई मंत्री हिल्स में विकास के लिए लोगों से बातचीत करते नजर आए। पिछले दिनों सूबे के कई मंत्री आए और विकास की संभावनाओं पर विस्तृत से हर क्षेत्र के लोगों व वहां के स्थानीय अधिकारियों से बातचीत की। माना कि दार्जिलिंग में पर्यटन के विकास से कई समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। इसके तहत कई वर्षो से बंद रोप-वे को चालू कराने व विभिन्न स्थानों पर पर्यटन केंद्र खोलने की घोषणा की गई। इसके अलावा पेयजल, बिजली सहित अन्य मूलभूत समस्याओं को दूर करने पर भी जोर दिया गया। शिक्षा व रोजगार पर विशेष जोर : बताने की जरूरत नहीं है कि कई वर्षो से अलग राज्य गोरखालैंड के आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन के कारण हिल्स रोजगार व शिक्षा में पिछड़ता जा रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ऐसी कोई भी बड़ी औद्योगिक इकाई नहीं है, जहां पर हिल्स के लोगों को रोजगार मिल पाए। बीते कई वर्षो से यहां रोजगार के अवसर के रूप में सिर्फ दो साधन पर्यटन व चाय बागान हैं। आंदोलन के कारण पर्यटन बहुत प्रभावित हुआ और चाय बागानों में ज्यादातर आदिवासी लोग हैं। ज्यादातर गोरखा समुदाय पर्यटन व्यवसाय पर ही निर्भर है और इसके प्रभावित होने से उनके रोजी-रोटी पर संकट आना स्वाभाविक है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने पर्यटन पर जोर दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि पहाड़ में रोजगार का संकट दूर किया जाएगा और लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए हर संभव प्रयास होंगे। शिक्षा की गुणवत्ता पर भी चिंता जताई और पहाड़ में तकनीकी कॉलेज खोलने के लिए प्रस्ताव बनाने और यहां की शिक्षा के ढांचागत विकास का आश्वासन दिया है। फिल्म सितारे हुए अवतरित : इसे बदलाव ही कहेंगे कि पिछले दिनों दार्जिलिंग सहित अन्य स्थानों पर कई वर्षो बाद फिल्म की शूटिंग हुई। जाने-माने फिल्म निर्देशक अनुराग बासु ने स्वीकार किया कि दार्जिलिंग के बारे में उन्हें कई लोगों ने आगाह किया था कि यहां उन्हें फिल्म की शूटिंग नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह भी माना कि दार्जिलिंग से फिल्म की लोकेशन के लिए महत्वपूर्ण व संुदर स्थान है। पहाड़ में बीते दिनों भूस्खलन आने के बावजूद अनुराग सड़कों पर कैमरा लेकर शूटिंग करते देखे गए। वह दार्जिलिंग को बहुत प्यार करते हैं। रणबीर कपूर के साथ आए अनुराग ने कहा कि वह सितंबर में फिर लौट कर आएंगे और अपनी फिल्म यहीं पूरी करेंगे। उनके साथ प्रियंका चोपड़ा भी आएंगी।


ऐसा होगा प्राधिकरण
हाड़ की समस्या का निदान करने के लिए सोमवार को त्रिपक्षीय वार्ता के बाद गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्राधिकरण की घोषणा हो जाएगी। दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद का नाम बदलकर बनाए गए इस प्राधिकरण के हाथ में विकास कार्यो को तेजी देने के लिए कई विभाग बनाए जा गए हैं। बने 59 विभाग : गोरखालैंड प्राधिकरण के तहत 59 विभाग हैं। इनकी संख्या पूर्व में ज्यादा थी, लेकिन इनमें संशोधन किया गया। इन विभागों के शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, विकास, पेयजल, आपूर्ति, पर्यटन सहित कई विभाग हैं। इनका कार्य सभी समस्याओं का निदान करना होगा और इसके लिए रूपरेखा तैयार करना होगा। बनेगी संचालन समिति : प्राधिकरण के संचालन के लिए 45 सदस्यीय समिति बनाई गई है। इसके अलावा इसके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष को भी इसके लिए नामित किया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था द्वारा यह कमेटी पहाड़ के विकास का खाका तय करेगी। इसके तहत विकास कार्यो को गति देना, समस्याओं का निदान करना सहित कई अधिकार प्राधिकरण के पदाधिकारियों को दिये जाएंगे। आने वाले दिनों में होंगे चुनाव : गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्राधिकरण में पदाधिकारियों के लिए आने वाले दिनों में चुनाव होंगे। इसके लिए पूर्व में मुख्यमंत्री और गोजमुमो प्रतिनिधिमंडल के बीच वार्ता से निर्णय लिया जा चुका है। दोनों पक्षों का कहना था कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी और कोई भी अपनी भागीदारी निभा सकता है। जनता की समस्या का सीधा समाधान : आने वाले दिनों में प्राधिकरण हिल्स के लोगों के समस्याओं को दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। इसके लिए सीधे शिकायत की व्यवस्था की जाएगी। इसके तहत लोग अपने क्षेत्र की समस्या बनाएंगे और इसके समाधान पर प्राधिकरण अपनी बैठक में चर्चा करेगा। इस दौरान इसके लिए निर्णय लिया जाएगा और विभागीय अधिकारियों के साथ इसका निदान होगा। कार्यालय में लौटी रौनक : कई दिन बाद दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद का नाम बदलकर गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्राधिकरण करने के बाद कार्यालय में रौनक लौट गई है। पूर्व में जो भी आंदोलन हुए थे, उस दौरान दागोपाप कार्यालयों को भी निशाना बनाया गया था। इस बीच प्राधिकरण बनने के बाद कार्यालयों में रंग-रोगन का भी कार्य तेजी से हुआ है। बरती जाएगी पारदर्शिता : प्रस्तावित प्राधिकरण में पारदर्शिता बरती जाएगी। इसको लेकर गोजमुमो, प्रदेश व केंद्र सरकार ने पूर्व में ही घोषणा कर दी है। इसके तहत करोड़ों रुपए के पैकेज की भी घोषणा कर दी गई है।

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