कश्मीर समस्या का सर्वमान्य हल तलाशने के लिए राज्य के पांच दिवसीय दौरे पर आए केंद्रीय वार्ताकारों ने आखिर मान ही लिया कि अलगाववादी इस समस्या का हल नहीं चाहते। अलगाववादी कश्मीर मसले को ज्यादा से ज्यादा समय तक लटकाए रखना चाहते हैं, ताकि उनकी सियासत चलती रहे। वार्ताकारों ने यह भी माना कि आम कश्मीरी अपनी मर्जी से नहीं बल्कि डर के मारे अलगाववादियों और आतंकियों का समर्थन करता है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगावकर के नेतृत्व में गुरुवार को उत्तरी कश्मीर के सोपोर व हंदवाड़ा का दौरा कर लौटे वार्ताकार पूर्व सूचनायुक्त एमएम अंसारी ने दैनिक जागरण को बताया कि उन्हें हुर्रियत कांफ्रेंस समेत विभिन्न अलगाववादी नेताओं से मुलाकात न होने का कोई मलाल नहीं है। अंसारी ने कहा कि अलगाववादी खेमा चाहता है कि यह समस्या हमेशा बनी रहे। इसलिए वह इसके हल में सहयोग नहीं कर रहा है। कश्मीर समस्या के बने रहने तक उनकी सियासत रहेगी और समस्या के हल होने पर उनकी पूछ समाप्त हो जाएगी। रही बात लोगों द्वारा उन्हें समर्थन देने की तो आम कश्मीरी डर के मारे अलगाववादियों और आतंकियों का समर्थन करता है। दल में शामिल शिक्षाविद्ध राधाकुमार ने कहा कि अगर हुर्रियत कांफ्रेंस के लोग यह सोचते हैं कि उनके बातचीत में शामिल न होने से कश्मीर समस्या हल नहीं होगी तो वह गलत हैं। वह हमसे मुलाकात करें या न करें, वह शांति प्रक्रिया का हिस्सा बने या न बनें, लेकिन कश्मीर में जल्द ही अमन बहाल होगा। वहीं पडगावकर ने कहा कि हम अगले एक पखवाड़े के दौरान अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंप देंगे। उन्होंने बताया कि गुरुवार को हम सोपोर व हंदवाड़ा गए थे। गत 25 जनवरी को सोपोर में आतंकियों द्वारा मौत के घाट उतारी गई दो बहनों आरिफा और अख्तर के परिजनों के अलावा चोंगल-हंदवाड़ा में मंजूर अहमद गनई के परिजनों से भी मिले। गनई पांच फरवरी को सेना की एक नाका पार्टी द्वारा आतंकियों के संदेह में मारा गया था। पडगावकर ने कहा कि हमें इस बात का संतोष है कि राज्य सरकार ने पीडि़तों के जख्मों पर मरहम के लिए अनुग्रह राशि जारी करने के अलावा कुछ और भी पग उठाए हैं।
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