Monday, July 18, 2011

सत्याग्रह पर व्यर्थ के सवालृ लेख

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अन्ना हजारे के सत्याग्रह को सरकार भले ही ब्लैकमेलिंग करार दे रही हो, लेकिन सच यही है कि सरकार ने उनसे वादाखिलाफी की है। अन्ना हजारे को चाहिए कि वह भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों के खात्मे के लिए जन लोकपाल के मुद्दे पर न तो हताश हों और न ही आंदोलन की चिंगारी को बुझने दें। यदि सरकार को अपनी ही बातों पर अडिग रहना था तो फिर संयुक्त मसौदा समिति के गठन की जरूरत ही क्या थी
ठ्ठ राजकिशोर अब यह लगभग निश्चित हो चला है कि अन्ना हजारे अगले महीने की 16 अगस्त को एक बार फिर अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठने जा रहे हैं
, लेकिन इस बार स्थिति पहले की तुलना में कुछ अलग होगी। पिछली बार सरकार ने उनके कार्यक्रम में कोई बाधा नहीं पैदा की थी। उलटे सहयोग ही किया था। तब सत्याग्रह के दूसरे दिन से ही सरकार के प्रतिनिधियों ने उनसे सम्मानपूर्वक बातचीत शुरू कर दी थी। अंत में आपसी समझौता भी सम्मानजनक वातावरण में हुआ था, लेकिन इस बार सरकार उनसे और उनकी टीम से खासा क्षुब्ध है इसलिए वह अन्ना हजारे के सत्याग्रह को कुचलने में कुछ भी उठा नहीं रखना चाहेगी। यह संभावना साफ-साफ दिखाई दे रही है। यह बहस तो अभी से शुरू हो गई है कि सत्याग्रह ब्लैकमेल का ही एक सभ्य तरीका है। हालांकि, इस तरह की चर्चा करते समय यह बात बड़ी आसानी से भुला दी जाती है कि ब्लैकमेल के पीछे निजी स्वार्थ होता है जब कि सत्याग्रह का संबंध सार्वजनिक हित से है। सत्याग्रह किसी न किसी रूप में महात्मा गांधी के पहले भी था। गांधीजी ने इसे एक व्यवस्थित सिद्धांत पर खड़ा करके एक दर्शन का रूप दिया और स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान राजनीतिक प्रतिकार के रूप में इसका इस्तेमाल किया। उन्होंने ही इसके नियम भी विकसित किए और पूर्व शर्ते निर्धारित कीं। फिर भी अभी तक सत्याग्रह का कोई निश्चित स्वरूप उभर कर नहीं आ सका है। हालांकि, जरूरत इस बात की थी कि गांधीजी के बाद सत्याग्रह के और भी प्रयोग होते जिससे यह औजार अपनी पूरी चमक और प्रभाव के साथ हमारे सामने आता और हर औरत-आदमी अपने निजी जीवन में ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी इसका सार्थक और असरदार इस्तेमाल कर सकता। उपवास की समस्याओं से महात्मा गांधी अनजान नहीं थे। इस बारे में उन्होंने लिखा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उपवास वस्तुत: जोर-जबरदस्ती करने का साधन बनाया जा सकता है। उदारहण के तौर पर किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए किए गए उपवास ऐसे ही श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। किसी आदमी से रूठने, ऐंठने या किसी व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया उपवास जोर-जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव के प्रयोग की सीमा में आता है। इस बारे में गांधीजी कहते हैं कि मैं नि:संकोच ऐसे अनुचित प्रभाव का प्रतिकार करने का समर्थन करूंगा। गांधीजी ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति चाहे वह कितना ही लोकप्रिय या महान क्यों न हो यदि वह किसी अनुचित मुद्दे को उठाता है और अपने उस अनौचित्यपूर्ण लक्ष्य की रक्षा के लिए उपवास करता है अथवा इसका सहारा लेता है तो यह उसके मित्रों, सहयोगियों और संबंधियों-जिनमें मैं अपनी गिनती भी करता हूं का कर्तव्य बनता है कि उसकी प्राणरक्षा के लिए अनुचित मुद्दे को मनवाने की अपेक्षा उसे मर जाने दें। उद्देश्य अनुचित हो तो शुद्ध से शुद्ध साधन भी अशुद्ध बन जाते हैं। सत्याग्रह की उपयोगिता या सफलता के बारे में गांधीजी के जीवनकाल में ही गंभीर संदेह और मतभेद उभरे थे। उनकी हंसी उड़ाते हुए लोग यहां तक कहा करते थे कि भूखा रहने से कहीं आजादी मिलती है। यहां तक कि गोपालकृष्ण गोखले भी जिन्हें महात्मा गांधी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे-सत्याग्रह को शक की निगाह से देखते थे। इसकी तुलना में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का यह आह्वान लोगों को ज्यादा आकर्षित करता था कि तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। नेताजी के इस आह्वान के पीछे आकर्षण का कारण यह था कि खून देने और खून लेने की घटनाओं से इतिहास पटा पड़ा है। खून ले-लेकर ही अंग्रेजों ने भारत को अपने कब्जे में कर लिया था, लेकिन गांधीजी इस परंपरा को उलटना चाहते थे। यह जनहित के साथ उनका पूर्ण तादात्म्य था और उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई भी कि लाखों लोगों ने उनके रास्ते को अपनाया। आज भी यह रास्ता खुला है अगर कोई इस पर पूरी शुद्धता और ईमानदारी के साथ चले। शुद्धता को जांचने के कई तरीके हैं। पहला, क्या किसी भी तरह के सत्याग्रह शुरू करने से पहले समस्या के समाधान अथवा सार्वजनिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अन्य सभी उपायों को आजमाया जा चुका है? अगर कोई अचानक ही उपवास की घोषणा कर दे तो इसके पीछे नीति नहीं राजनीति देखनी चाहिए। इसी तरह सत्याग्रह प्रसिद्धि पाने के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के उद्देश्य से नहीं होना चाहिए और शक्ति प्रदर्शन के लिए तो बिल्कुल ही नहीं। इससे सत्याग्रह के उद्देश्य पर शक करने की गुंजाइश पैदा हो जाती है। तीसरा, एक सत्याग्रही का निजी जीवन स्वच्छ और सार्वजनिक रूप से पारदर्शी होना चाहिए। वह झूठ न बोलता हो, गलत दावे न करता हो, उसके मन में समृद्धि अथवा सफलता के प्रति आसक्ति न हो तथा गरीबों और आम लोगों की सहायता करने में उसे आनंद आता हो। चौथा, उसने अपने किसी काम को व्यवसाय का रूप न दिया हो और उससे मुनाफा कमाने की न तो इच्छा रखता हो और न ही धनार्जन करता हो। स्वयं दीनहीन की तरह रहने से कुछ नहीं होता। देखने की बात यह भी है कि उसके इर्द-गिर्द कोई आर्थिक सल्तनत अथवा साम्राज्य तो नहीं खड़ी हो रही है। यदि ईमानदारी से देखा जाए तो इन सभी कसौटियों पर अन्ना हजारे का सत्याग्रह खरा उतरता है। पता नहीं अन्ना के इस बार के सत्याग्रह को पहली बार जैसी लोकप्रियता मिलेगी अथवा नहीं। अगर नहीं मिल सके तो उम्मीद और निवेदन दोनों है कि वह हताश नहीं होंगे और अपने आंदोलन के चिराग को बुझने नही देंगे। जन लोकपाल के मुद्दे पर सरकार ने निश्चय ही उनके साथ वादाखिलाफी की है। अगर सरकार को उन बातों पर अडिग रहना ही था जिन पर वह पहले से जोर दे रही थी तो विधेयक के प्रारूप पर विचार करने के लिए संयुक्त मसौदा समिति का गठन करने की जरूरत ही नहीं थी। इसे हम अन्ना हजारे और उनकी टोली की भलमनसाहत मानते हैं कि उन्होंने सरकार के आश्वासन पर सहज ही विश्वास कर लिया। अब जबकि यह स्पष्ट हो चुका है कि सरकार एक ऐसे लोकपाल के पक्ष में है जिसके पास जांच करने और सजा देने की शक्ति न हो। सरकारी तंत्र का एक बड़ा हिस्सा गैर-आइएएस अधिकारी और कर्मचारी उसके दायरे से बाहर हों तो हम सभी को यह आवाज उठानी ही चाहिए कि हमें सरकारी लोकपाल की जरूरत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के साथ प्रभावी तरीके से निपट सकने वाला जन लोकपाल चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

एक नजर में गोरखालैंड आंदोलन

: इस वर्ष में भी अलग राज्य की मांग उठी, लेकिन तब हिल्स की गोरखाओं की कुल आबादी महज 10 हजार थी, लिहाजा आवाज दबी रह गई। वर्ष 1907 : दार्जिलिंग का मसला शुरू से ही अटकटा रहा है। 1907 में बंगाल-बिहार के बंटवारे के बाद दार्जिलिंग का भू-भाग भागलपुर कमिश्नरी के अधिकार क्षेत्र में पड़ा। उसी वक्त हिल्स के लोगों ने अपने लिए अलग प्रशासनिक अधिकार का मांग पत्र सौंपा और इसी प्रक्रिया के बाद कर्सियांग और सिलीगुड़ी को नगर निगम का दर्जा मिला। वर्ष 1917 : कहा जाता है कि अलग राज्य की मांग इसी वर्ष पहली बार उठी। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया एडविन मोंटेग्यू को हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से एक आवेदन के तहत दार्जिलिंग, डुवार्स, असम और नेफा (अरूणांचल प्रदेश) को लेकर नार्थ ईस्ट फ्रंटियर के रूप में अलग राज्य की मांग की गई। वर्ष 1920 : भारतीय संविधान में नौंवे संशोधन के तहत दार्जिलिंग को बैकवर्ड ट्रैक्ट बताया गया जिसे हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से अस्वीकार कर दिया गया। तराई के लोगों के शासन को नकारते हुए एसोसिएशन की ओर से अलग मांग पत्र रखा गया। इसी वर्ष अलग दार्जिलिंग एवं तराई को मिलाकार अलग राज्य की मांग करने वाले हिलमेंस एसोसिएशन को इस बार अंग्रेजी सदस्यता वाली दार्जिलिंग प्लांटर्स एसोसिएशन एवं यूरोपियन एसोसिएशन ऑफ दार्जिलिंग का भी सहयोग प्राप्त हुआ। वर्ष 1929 : इंग्लैंड से इंडिया के दौरे पर आए साइमन कमीशन के समक्ष हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से एक बार फिर अलग राज्य की मांग उठाई गई। इसी साल झारखंड राज्य की भी मांग उठी और यहां के लोगों को और बल मिला। वर्ष 1934 : स्वशासन की पिछली सभी मांगे अस्वीकृत होने के बाद छह अगस्त को एस डब्ल्यू लादेन ला, लेफ्टिनेंट गोब‌र्द्धन गुरुंग और मदन थापा की अगुवाई में हिल्स एसोसिएशन ने सेक्रेटरी फार इंडिया सैमुअल को एक बार फिर अपनी मांग के साथ आवेदन पत्र सौंपा। वर्ष 1935 : हिलमेंस एसोसिएशन की ओर से रूपनरायण सिन्हा ने 1915 एक्ट का विरोध करते हुए पहली बार आंदोलन को नाम देते हुए होमलैंड की मांग उठाई। वर्ष 1937 : कलिम्पोंग हिलमेंस एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राय प्रसाद हरि प्रसाद प्रधान ने प्रत्यक्ष तौर पर सरकार हिल्स को बंगाल से अलग करने की अपील की। वर्ष 1941 : अब तक लोगों को समझ में आ गया था कि मात्र मांग पत्र सौंपने से कुछ नहीं होने वाला है। इसी के बाद राजनीतिक स्तर पर सक्रियता बढ़ाई गई। 1943 में डम्बर सिंह गुरुंग ने ऑल इंडिया गोरखालीग की स्थापना की। वर्ष 1944 : यह सरकारी तौर पर की गई मांग नहीं थी। दरअसल महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना दार्जिलिंग आए हुए थे। गोरखाओं के प्रतिनिधियों ने दोनों नेताओं से मिलकर स्वशासन की पुरानी मांग उठाई। 1945 में सीपीआइ ने गोरखालीग से अपनी संबंध तोड़ लिया और अलग राज्य का नाम रख कर गोरखास्थान आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया। वर्ष 1947 : सीपीआइ की दार्जिलिंग जिला इकाई ने भारत के अंतरिम सरकार के उप राष्ट्रपति जवाहर लाल नेहरु और वित्त मंत्री लियाकत अली खान से गोरखास्थान बनाए जाने की मांग की। इसी दौरान गोरखा बनाम नेपाली समुदाय के बहाने विवाद उत्पन्न करने की कोशिश की गई। कुछ साल के भीतर विवाद यह कहते हुए साफ कर दिया गया कि गोरखा जाति है और नेपाली भाषा। वर्ष 1948 : डम्बरसिंह गुरुंग की मौत के बाद नरबहादुर गुरुंग ने ऑल इंडिया गोरखालीग की कमान संभाली। गोरखास्थान के लिए प्रधानमंत्री नेहरु को पत्र लिख कर तीन विकल्प सुझाए। इसमें केंद्र सरकार के अधीन अलग प्रशासनिक इकाई या दार्जिलिंग और पड़ोसी इलाकों को लेकर एक अलग प्रान्त या दार्जिलिंग, डुआर्स और असम को मिलाकर स्वशासी प्रदेश मांग रखी गई। वर्ष 1949 : दार्जिलिंग, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और सिक्किम के कई नेता दार्जिलिंग में जुटे उन लोगों ने उत्तर खंड प्रदेश संघ नामक संगठन के निर्माण की घोषणा की। दिल्ली जाकर तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से संघ के नेताओं ने जाकर मुलाकात की। 1949 : सिक्किम दौरे पर आए विदेश मंत्री के समक्ष गोरखा नेताओं ने एक बार फिर गोरखास्थान की मांग उठाई। वर्ष 1952 : प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार नेहरु दार्जिलिंग आए थे। कलिम्पोंग में ग्राहम हाउस देखने के बाद गोरखालीग ने उनसे नार्थ ईस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स की मांग की। वर्ष 1955 : दार्जिलिंग दौरे पर राज्य पुर्नगठन समिति के अध्यक्ष के सामने श्रमिक संघ ने अलग राज्य के लिए अपने तर्क पेश किए। वर्ष 1955 : आज तक छोटे छोटे संगठन सामूहिक तौर पर अलग राज्य की मांग कर रहे थे पहली बार ऑल कमेटी डिस्टि्रक आर्गेनाइजेशन के बैनर तले सामूहिक रूप से अलग राज्य का तर्क पेश किया। वर्ष 1980 : गोरखालीग के बाद प्रान्त मोर्चा ने गोरखालैंड के लिए आंदोलन को गति दी। अपने हजारों समर्थकों की अपील पर मोर्चा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को टेलीग्राम कर अलग राज्य की मांग की। उन्हें विश्वास दिलाया गया कि गोरखालैंड अस्तित्व में आने के बाद भी भारत का ही अंग रहेगा। वर्ष 1982 : गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट के पक्ष में जनसमर्थन के मद्देनजर प्रांत परिषद के अध्यक्ष इंद्रबहादुर राय ने जनवरी में गृहमंत्री ज्ञानी सिंह को पक्ष लिखकर दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को मिलाकर गोरखालैंड बनाने की मांग की। वर्ष 1986 : सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिब्ररेशन फ्रंट में पढ़े लिखे लोगों को बहुत कम जगह दी गई और इसके बाद ही स्टडी फोरम का गठन किया गया। घीसिंग के उग्र आंदोलन के बाद आखिरकार दागोपाप का गठन हुआ और कुछ वर्षो तक स्थिति शांत रही लेकिन पहाड़ देश से अलग होता चला गया और विकास से कोषों दूर। इसके बाद वर्ष वर्ष 2004 में विमल गुरुंग का उदय हुआ और उन्होंने अलग पार्टी बनाकर आंदोलन को आगे ले जाने का बीड़ा उठाया।
107 साल के बाद
हिल्स के लोगों के लिए सोमवार का दिन सबसे महत्वपूर्ण रहेगा। इसका सिर्फ एक कारण त्रिपक्षीय वार्ता ही नहीं बल्कि कई कारण होंगे। कई वर्षो बाद यहां के लोगों में विकास की उम्मीद जगी है। शिक्षा, चिकित्सा, सुविधाओं, पर्यटन के विकास की बात हो रही है। इससे लोगों में उत्साह का संचार हुआ है और नजरिया भी बदला है। अब हर बात पर आंदोलन नहीं बल्कि इसे रोकने की बात की जा रही है। यही वजह था कि पिछले दिनों फिल्म निर्देशक अनुराग बासु की फिल्म की शूटिंग के दौरान गोजमुमो कार्यकर्ता उनके साथ खड़े रहे। बात-बात पर आंदोलन करने वाले गोजमुमो कार्यकर्ता अब विकास की बातें कर रहे हैं और अन्य स्थानीय दलों से भी इसमें सहयोग मांग रहे हैं। जादुई फार्मूले का असर दिखाई देने लगा है। तकरीबन 107 वर्ष के बाद गोरखालैंड नाम को मान्यता मिल गई है। इसे लेकर हिल्स के लोगों आंदोलन के बजाय अब विकास के लिए बहस शुरू हो गई है। लोग गली और सड़कों पर खड़े होकर कहते हैं कि अलग राज्य नहीं, लेकिन गोरखालैंड का नाम मिल गया। चाहे जो हो माना जा रहा है कि त्रिपक्षीय वार्ता के बाद नई व्यवस्था के लागू होने से विकास कार्यो को गति मिलेगी और हिल्स के प्रति लोगों की मानसिकता भी बदलेगी। सही मायने में देखा जाए तो इस समय पहाड़ में नई राजनीति करवट ले रही है और विकास का भी उदय हो रहा है। प्रदेश की मुखिया ने सभी दलों को नई व्यवस्था में सहयोग देने की अपील की है और पहाड़ को आगे बढ़ाने के लिए हाथ बढ़ाने को कहा है। ऐसे में सावन का पहला सोमवार लोगों के लिए कई सौगातें लेकर आएगा। समय बदला है। अतीत के आइने में देखें तो आंदोलन और बंदी के कारण कई लोगों की जानें गई व करोड़ों का नुकसान हुआ। बीते कई वर्षो से पहाड़ में तो यही देखने को मिला और अलग राज्य गोरखालैंड के लिए आंदोलन भी थमने का नाम नहीं ले रहे थे। इसको रोकने को लेकर केंद्र व वाम शासन काल में गोजमुमो प्रतिनिधिमंडल की कई चक्र वार्ताएं हुई, लेकिन सभी बेनतीजा रही। गोजमुमो ने अपनी मांग मनवाने के लिए कई बार पहाड़ बंद आंदोलन किया। इसके तहत पहाड़ के सभी सरकारी व गैर सरकारी कार्यालय भी बंद कराए। आंदोलन कई बार इतना तेज हुआ, जिससे पहाड़ का जनजीवन भी प्रभावित हुआ। इसके बाद फिर अघोषित काल के लिए दुकानों के शटर गिर गए, वाहनों के पहिए थमने, पर्यटकों के पलायन का सिलसिला अनवरत जारी रहा। करोड़ों का व्यापार प्रभावित हुआ और हिल्स को आंदोलन का केंद्र मान लिया गया। ऐसे में विधानसभा चुनाव ने हिल्स में अलग ही स्फूर्ति भर दी। परिणाम घोषित हुए और बंगाल में 34 वर्षो से जल रही लाल बत्ती बुझ गई। लोगों ने कहा बंगाल को ग्रीन सिग्नल मिल गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुर्सी पर आई और अपने वादे पहाड़ को स्विट्जरलैंड बनाने की मुहिम के तहत उन्होंने पहाड़ क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श करना शुरू कर दिया। वार्ता का परिणाम भी सार्थक रहा और मंत्रियों ने मुखिया के निर्देश पर पहाड़ का दौरा किया। ऐसे में ममता सरकार द्वारा की जा रही पहल से पहाड़वासियों में भी आशा की किरण जगना स्वाभाविक है। गोजमुमो व राज्य की नई सरकार के बीच जो नए रिश्ते उभर रहे हैं उससे पहाड़ की विपक्षी पार्टियां भौचक्क हैं। यह दीगर है कि सभी ने एक साथ प्रदेश सरकार व गोजमुमो की वार्ता को असफल बताने के लिए एक के बाद एक बयान दिये। शुरू हुई बदलाव की बयार : हिल्स इस समय बदलाव चाहता है। गोजमुमो नेताओं का कहना है कि यह समय की मांग है, लेकिन यह कहने से गुरेज नहीं कि अलग राज्य का गठन गोरखाओं की अस्मिता से जुड़ा है और इसकी मांग जारी रहेगी। पिछले दिनों मोर्चा के प्रतिनिधिमंडल की कोलकाता, दिल्ली में केंद्रीय नेताओं से वार्ता हुई। इसके बाद कई निर्णय हुए। नतीजे के अनुसार चाय बागानों में कार्यरत श्रमिकों को स्थायी करने के लिए मानक बनाए गए। उनकों सुविधाएं मुहैया कराने पर भी मुहर लगाई गई। प्रदेश की मुखिया ममता बनर्जी के निर्देश के बाद आनन-फानन में कई मंत्रियों ने पहाड़ का दौरा किया। सभी ने स्वीकार किया कि वह मुख्यमंत्री के निर्देश पर आए और अपने दौरे की रिपोर्ट वह ममता बनर्जी को देंगे। मुख्यमंत्री रिपोर्ट के अनुसार आगे की रूप-रेखा तैयार करेंगी। आने वाले दिनों में त्रिपक्षीय वार्ता के बाद विकास के रास्ते खुलने की उम्मीद है। मूलभूत समस्याएं : मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहाड़ की सभी समस्याओं से पिछले दिनों गोजमुमो के प्रतिनिधिमंडल ने अवगत कराया। इसके बाद उन्होंने यहां की मूलभूत समस्याओं को दूर करने के बाबत घोषणा की। इसमें पुरानी योजनाओं को लागू व इसे क्रियान्वित कराने में तेजी लाना भी शामिल है। इसके अलावा रोजगार व पर्यटन के दृष्टि से भी कई कदम उठाने की बात की। इसके तहत कई कदम भी उठाए और पैकेज की घोषणा की। विकास की संभावनाएं : ऐसा कई दिनों बाद हुआ जब प्रदेश के कई मंत्री हिल्स में विकास के लिए लोगों से बातचीत करते नजर आए। पिछले दिनों सूबे के कई मंत्री आए और विकास की संभावनाओं पर विस्तृत से हर क्षेत्र के लोगों व वहां के स्थानीय अधिकारियों से बातचीत की। माना कि दार्जिलिंग में पर्यटन के विकास से कई समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। इसके तहत कई वर्षो से बंद रोप-वे को चालू कराने व विभिन्न स्थानों पर पर्यटन केंद्र खोलने की घोषणा की गई। इसके अलावा पेयजल, बिजली सहित अन्य मूलभूत समस्याओं को दूर करने पर भी जोर दिया गया। शिक्षा व रोजगार पर विशेष जोर : बताने की जरूरत नहीं है कि कई वर्षो से अलग राज्य गोरखालैंड के आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन के कारण हिल्स रोजगार व शिक्षा में पिछड़ता जा रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ऐसी कोई भी बड़ी औद्योगिक इकाई नहीं है, जहां पर हिल्स के लोगों को रोजगार मिल पाए। बीते कई वर्षो से यहां रोजगार के अवसर के रूप में सिर्फ दो साधन पर्यटन व चाय बागान हैं। आंदोलन के कारण पर्यटन बहुत प्रभावित हुआ और चाय बागानों में ज्यादातर आदिवासी लोग हैं। ज्यादातर गोरखा समुदाय पर्यटन व्यवसाय पर ही निर्भर है और इसके प्रभावित होने से उनके रोजी-रोटी पर संकट आना स्वाभाविक है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने पर्यटन पर जोर दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि पहाड़ में रोजगार का संकट दूर किया जाएगा और लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए हर संभव प्रयास होंगे। शिक्षा की गुणवत्ता पर भी चिंता जताई और पहाड़ में तकनीकी कॉलेज खोलने के लिए प्रस्ताव बनाने और यहां की शिक्षा के ढांचागत विकास का आश्वासन दिया है। फिल्म सितारे हुए अवतरित : इसे बदलाव ही कहेंगे कि पिछले दिनों दार्जिलिंग सहित अन्य स्थानों पर कई वर्षो बाद फिल्म की शूटिंग हुई। जाने-माने फिल्म निर्देशक अनुराग बासु ने स्वीकार किया कि दार्जिलिंग के बारे में उन्हें कई लोगों ने आगाह किया था कि यहां उन्हें फिल्म की शूटिंग नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह भी माना कि दार्जिलिंग से फिल्म की लोकेशन के लिए महत्वपूर्ण व संुदर स्थान है। पहाड़ में बीते दिनों भूस्खलन आने के बावजूद अनुराग सड़कों पर कैमरा लेकर शूटिंग करते देखे गए। वह दार्जिलिंग को बहुत प्यार करते हैं। रणबीर कपूर के साथ आए अनुराग ने कहा कि वह सितंबर में फिर लौट कर आएंगे और अपनी फिल्म यहीं पूरी करेंगे। उनके साथ प्रियंका चोपड़ा भी आएंगी।


ऐसा होगा प्राधिकरण
हाड़ की समस्या का निदान करने के लिए सोमवार को त्रिपक्षीय वार्ता के बाद गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्राधिकरण की घोषणा हो जाएगी। दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद का नाम बदलकर बनाए गए इस प्राधिकरण के हाथ में विकास कार्यो को तेजी देने के लिए कई विभाग बनाए जा गए हैं। बने 59 विभाग : गोरखालैंड प्राधिकरण के तहत 59 विभाग हैं। इनकी संख्या पूर्व में ज्यादा थी, लेकिन इनमें संशोधन किया गया। इन विभागों के शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, विकास, पेयजल, आपूर्ति, पर्यटन सहित कई विभाग हैं। इनका कार्य सभी समस्याओं का निदान करना होगा और इसके लिए रूपरेखा तैयार करना होगा। बनेगी संचालन समिति : प्राधिकरण के संचालन के लिए 45 सदस्यीय समिति बनाई गई है। इसके अलावा इसके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष को भी इसके लिए नामित किया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था द्वारा यह कमेटी पहाड़ के विकास का खाका तय करेगी। इसके तहत विकास कार्यो को गति देना, समस्याओं का निदान करना सहित कई अधिकार प्राधिकरण के पदाधिकारियों को दिये जाएंगे। आने वाले दिनों में होंगे चुनाव : गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्राधिकरण में पदाधिकारियों के लिए आने वाले दिनों में चुनाव होंगे। इसके लिए पूर्व में मुख्यमंत्री और गोजमुमो प्रतिनिधिमंडल के बीच वार्ता से निर्णय लिया जा चुका है। दोनों पक्षों का कहना था कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी और कोई भी अपनी भागीदारी निभा सकता है। जनता की समस्या का सीधा समाधान : आने वाले दिनों में प्राधिकरण हिल्स के लोगों के समस्याओं को दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। इसके लिए सीधे शिकायत की व्यवस्था की जाएगी। इसके तहत लोग अपने क्षेत्र की समस्या बनाएंगे और इसके समाधान पर प्राधिकरण अपनी बैठक में चर्चा करेगा। इस दौरान इसके लिए निर्णय लिया जाएगा और विभागीय अधिकारियों के साथ इसका निदान होगा। कार्यालय में लौटी रौनक : कई दिन बाद दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद का नाम बदलकर गोरखालैंड स्वायत्तशासी प्राधिकरण करने के बाद कार्यालय में रौनक लौट गई है। पूर्व में जो भी आंदोलन हुए थे, उस दौरान दागोपाप कार्यालयों को भी निशाना बनाया गया था। इस बीच प्राधिकरण बनने के बाद कार्यालयों में रंग-रोगन का भी कार्य तेजी से हुआ है। बरती जाएगी पारदर्शिता : प्रस्तावित प्राधिकरण में पारदर्शिता बरती जाएगी। इसको लेकर गोजमुमो, प्रदेश व केंद्र सरकार ने पूर्व में ही घोषणा कर दी है। इसके तहत करोड़ों रुपए के पैकेज की भी घोषणा कर दी गई है।

Thursday, May 5, 2011

धमाकों के आरोपी मदनी को जमानत देने पर उभरे मतभेद


बेंगलूर विस्फोट के आरोपी अब्दुल नासिर मदनी की जमानत पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में मतभेद उभर आए। पीठ ने मामले को मुख्य न्यायाधीश एचएस कपाडि़या के पास भेज दिया है। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने कहा कि यह प्रकरण दूसरी पीठ गठित करने के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि काटजू मदनी की जमानत मंजूर करने के पक्ष में थे। लेकिन ज्ञान सुधा मिश्रा राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा जैसे गंभीर आरोपों के मद्देनजर जमानत मंजूर करने के सख्त खिलाफ थीं। सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में बुधवार को मदनी की जमानत याचिका पर करीब डेढ़ घंटे तक बहस चली। पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति काटजू की राय थी कि मदनी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए। उसकी जमानत मंजूर करने में कुछ भी गलत नहीं है। न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा का मानना था कि टेलीफोन काल्स के विवरण विस्फोटों में उसकी संलिप्तता की ओर पर्याप्त इशारा कर रहे हैं। मदनी की ओर से पेश शांति भूषण की दलील थी कि उनके मुवक्किल को राजनीतिक कारणों से कर्नाटक सरकार ने गलत तरीके से फंसाया है, वह मुस्लिम समुदाय का बड़ा सियासी और सामाजिक नेता है|

Tuesday, May 3, 2011

उम्मीद की किरण


कश्मीर की फिजां में बदलाव नजर आने लगा है। कुछ महीने पहले तक हताश-निराश नजर आने वाले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अब आक्रामक मुद्रा में हैं। नौजवान अब्दुल्ला में यह नया आत्म-विश्वास केंद्र तथा खुद उनकी सरकार द्वारा उठाए गए रचनात्मक कदमों की वजह से आया है। इनकी शुरुआत मध्यस्थों और संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के दौरों, घाटी के लिए विकास पैकेज की घोषणा, जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेना में कश्मीरियों की भरती फिर से शुरू करने, बड़े कस्बों से सुरक्षा बलों की मौजूदगी को कम करने और सबसे महत्वपूर्ण नए कोर कमांडर के नेतृत्व में सेना द्वारा दिल के हथियार की रणनीति अपनाने से हुई है। संयोग से, नए कोर कमांडर, धरती के सपूत भी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अलगाववादियों को निष्कि्रय कर देने और उनके आपसी झगड़ों व मतभेदों के चलते कट्टरपंथी गिलानी को झटका लगा है और उन्हें यह घोषित करने पर मजबूर होना पड़ा है कि इन गरमियों में उनका विरोध-प्रदर्शनों का कोई इरादा नहीं है। लगता है उनकी समझ में आ गया है कि लोगों ने टकराव की उनकी नीति को ठुकरा दिया है, जिससे जनता को दुख-तकलीफों के सिवा और कुछ नहीं मिला है। सरकार के सुलह के प्रयास प्रदेश में शांति की स्थापना में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं। अगर अलगाववादियों ने यह मौका गंवा दिया तो कश्मीर समस्या के किसी भी भावी समाधान के लिए बातचीत से बाहर रहने के लिए जिम्मेदार वे खुद ही होंगे। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के नाकाम प्रयासों के बाद वे भी समझ गए हैं कि इस मुद्दे को एक राजनीतिक समस्या मानने और अपने क्षेत्र के लोगों को राजनीतिक स्तर पर बातचीत के लिए राजी करने से ही समस्या का समाधान निकल सकता है। अब हर कोई समझता है कि राज्य के विकास के लिए आर्थिक पैकेज बहुत जरूरी हैं। फिर भी कुछ साहसिक फैसले लेने जरूरी हंै। ऐसी पहलों के लिए अनुकूल माहौल पहली जरूरत है। सरकार के कटु आलोचक भी मानते हैं कि राज्य के लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति एक बड़ा कदम थी। इससे विभिन्न पक्षों के बीच संवादहीनता की स्थिति खत्म हुई है। एएफएसपीए को आंशिक रूप से वापस लेने, सैनिकों की संख्या में कमी के लिए अलगाववादियों के शोर-शराबे जैसी समस्याओं से बाद में निपटा जा सकता है। उमर अब्दुल्ला का हाल का एक और बयान भी स्वागत-योग्य है कि कश्मीरी पंडितों को वापस कश्मीर घाटी में बुलाने के एक बहु-आयामी कार्यक्रम पर उनकी सरकार काम कर रही है। हाल के महीनों में जमीनी स्थिति में सुधार को देखते हुए पंडितों को आश्वस्त करने का यही समय है। घाटी में शांति प्रक्रिया के लिए अगले कुछ महीने बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह समय है जब बर्फ पिघलती है, दर्रे खुलते हैं और सीमा पार से घुसपैठ शुरू होती है। साथ ही अमरनाथ यात्रा भी शुरू हो जाती है। पिछली चार गर्मियों से यही देखने में आया है कि इन सबके चलते माहौल खराब हो जाता है। मध्यस्थ जल्दी ही अपने निष्कर्ष केंद्र को सौंपेंगे। यह तो तय है कि वे विकास के पैकेज की सिफारिश करेंगे। इसके साथ ही गुमराह कश्मीरियों का मन जीतने के लिए दिल की रणनीति भी अपनाई जाएगी। अब अलगाववादियों को वार्ता में शामिल करने से ही तस्वीर पूरी हो पाएगी। अलगाववादियों को खुले दिमाग से फैसले लेने होंगे। इस प्रकार वे इतिहास में अपनी जगह सुरक्षित कर सकेंगे। इस बार जनता इच्छुक है, केंद्र सहयोग को तैयार है और राज्य सरकार प्रक्रिया को तार्किक परिणति तक पहुंचाने की इच्छुक है। फिलहाल गेंद गिलानी के पाले में है। देखते हैं, वे कौन सा खेल खेलते हैं। जो भी हो, इतिहास बनने जा रहा है! इस बीच घाटी, दम साधे इंतजार कर रही है! 

Wednesday, April 6, 2011

देश की एकता को चुनौती देते जहरीले विचार


चिदम्बरम स्वभाव से ही उत्तर-पू र्व क्षेत्रों के विरो धी हैं। देश में सार्वजनिक तौर पर इन क्षेत्रों का मजाक उड़ाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। अब उनके अंदर छिपा जहर सार्वजनिक हो गया है। भारत की भौगोलिक एकता के लिए इतने जहरीले व्यक्ति का गृहमंत्री की कुर्सी पर बना रहना खतरनाक है। देश की एकता, अखण्डता किसी भारतवंशी के लिए महत्व का विषय है। चिदम्बरम को स्मरण दिलाने की जरूरत है कि उनके जहरीले विचार देश की एकता को चुनौती देने वाले हैं
गृह मंत्री पी. चिदम्बरम राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति दुराग्रह का भाव रखते हैं, ऐसा मेरा शुरू से मानना है। उन्हें मैंने 1991 के बाद से आने वाली सभी सरकारों में मंत्री के रूप में देखा है। कभी एक शब्द हिंदी में बोलते मैंने नहीं सुना। एच.डी. देवगौड़ा 1996 में प्रधानमंत्री थे। उन्होंने फैसला किया कि राष्ट्र के नाम सम्बोधन हिंदी में ही करेंगे। उन्होंने अपने वचन का पालन किया। उनके वित्त मंत्री के रूप में चिदम्बरम ने काम किया लेकिन अपने प्रधानमंत्री की घोषणाओं का उन पर प्रभाव नहीं पड़ा। गृह मंत्री ने अपने अंदर पलने वाले जहर का खुलासा अमेरिकी राजनयिक के सामने कर दिया। अपने राज नेताओं की खूबी है कि वे देश की जनभावना का ध्यान कम रखते हैं। वे अमेरिकी अंग्रेजी प्रभुओं को खुश रखने में अपने सफल राजनीतिक जीवन का रहस्य ढूंढते हैं। अंग्रेजी विश्वविद्यालयों में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अंग्रेजी भाषा को अंग्रेजी राज की सर्वश्रेष्ठ देन घोषित करते हैं। चिदम्बरम तमिलनाडु का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। उस राज्य का जनमानस हिंदी के खिलाफ है। उसका प्रभाव गृह मंत्री के व्यक्तित्व पर रहता है।
हिंदी राज्यों के बिना अकल्पनीय है भारत
उन्हें भारत की आर्थिक तरक्की की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि देश के भूगोल में हिंदी बहुल अथवा उत्तर भारत के कुछ राज्य नहीं होते तो हमारी तरक्की की रफ्तार बढ़ जाती। यह उनकी अज्ञानता का सबसे बड़ा सबूत है। हिंदी बहुल राज्यों को अलग कर क्या भारत नाम की कल्पना की जा सकती है? भारत के शरीर से आत्मा को अलग कर शरीर की कल्पना की जा सकती है। देश के तटवर्त्ती राज्यों की तरक्की के ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण रहे हैं। करीब छ: सौ साल पहले पुर्तगाली नाविक वास्को डिगामा कालीकट आया था। दक्षिण भारत से यूरोप के जलमार्ग के सबसे नजदीक के रास्ते की उसने तलाश की उसके बाद से भारतीय उत्पादों की धूम यूरोपीय बाजारों में हो गई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है उत्तर की
दक्षिण भारत में जिन यूरोपीय देशों ने धावा वोला, उनका मूल उद्देश्य अपने व्यापार को बढ़ाना था। उत्तर भारत में 1200 वर्ष पहले से खैबर वोलन के रास्ते यूनान, समरकंद, मंगोलिया आदि देशों के आक्रमणकारी आते रहे। उनका उद्देश्य भारत की सम्पदा को लूटकर अपने देश वापस जाना था। केवल मुगलों का खानदान भारत में टिका और 300 वर्षो तक का भारतीय इतिहास उनके शासन का काल माना जा सकता है। उन्होंने अपने शासन में कला साहित्य, संगीत के क्षेत्र में योगदान अवश्य किया किंतु उनका शासनकाल आंतरिक विद्रोह को दबाने के नाम पर दमन और लूट का भी कार्यकाल है। अंग्रेजी सरकार ने तो 1857 से 1942 तक अपने साम्राज्य की सारी शक्ति इन्हीं क्षेत्रों के दमन में लगा दिया। अंग्रेजी राज के खिलाफ जनविद्रोह का लम्बा अध्याय हृदय प्रदेशों में लिखा गया। जितना उग्र विद्रोह उतना ही क्रूर दमन; 1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजी पलटन ने गंगा, जमुना, घाघरा के जलमार्ग को चुना और इन्हीं क्षेत्रों के सुदूर गांवों और इलाकों में हजारों की संख्या में निदरेष जनता मारी गई। मुगल दौर में भी पलटन को आसानी से पहुंचाने के लिए जलमार्ग का ही इस्तेमाल होता था। इसलिए गंगा, जमुना, घाघरा का मैदान दमन क्षेत्र था, जहां के गांव के गांव और कस्बे लूटे-उजाड़े गए। 1942 का संग्राम भी इन्हीं क्षेत्रों में लड़ा गया।
विदेशी जुल्म से कभी नहीं भिड़े तटीय राज्य
तटीय राज्यों ने विदेशी जुल्म के खिलाफ कभी बगावत नहीं की। 1942 के अंतिम विद्रोह में उनकी साझीदारी नाम मात्र की थी। उन क्षेत्रों में नाव से यातायात के सुगम रास्तों की जानकारी थी। वहां के जलमागरे का उपयोग व्यावसायिक और व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया गया। उत्तर भारत के दुर्गम र्दे और जलमार्ग इन क्षेत्रों को लूट और दमन के माध्यम थे। स्वाभाविक था हुकूमत करने वालों ने इन क्षेत्रों को हीनता की नजर से देखते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देना तो दूर व्यापार और उद्योग के सभी साधनों को नष्ट करने में अपनी शक्ति लगा दी। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति होने से पहले बंगाल, बिहार के सुदूर क्षेत्रों में हाथ से तैयार कपड़े की खपत ब्रिटेन और यूरोप खाड़ी के देशों में बड़ी मात्रा में होती थी। मशीन से तैयार ब्रिटिश कपड़े की खपत को बढ़ाने के लिए इन क्षेत्रों में होने वाले कपड़े के उत्पादों पर आक्रमण किए। करघे बंद कराए गए।
औपनिवेशिक जकड़न
ढाका के आसपास मलमल तैयार करने वाले कारीगरों के अंगूठे काट लेने के फरमान जारी किए गए। बड़े महानगर जिन्हें अंग्रेजों ने बसाया था। सूरत और मुम्बई के इर्द-गिर्द आधुनिक कपड़े की मिलें खोली गई। बिहार, बंगाल के सुदूर ग्रामीण इलाकों में पटसन से तैयार होने वाले बोरे बनाने की पद्धति को तोड़कर चटकल मिलें कलकत्ता में बनाई गई जहां ग्रामीण क्षेत्रों में भुखमरी के शिकार लोग इन महानगरों में रोजी तलाशने के लिए विवश हुए। तटीय राज्यों के लोग समुद्री मार्ग से यूरोप, अफ्रीका के देशों में बड़ी संख्या में व्यवसाय व ऊंची पढ़ाई के लिए जाने लगे। उत्तरी हिंदुस्तान के गरीब निरक्षर लोगों को ठेके पर मजदूर बनाकर यूरोपीय कॉलोनियों में खेती में काम करने के लिए जबरन बसाया गया। डच, अंग्रेज, पुर्तगाली शासक व्रिटिश गुयाना, मॉरिशस, ट्रिनिडाड आदि टापुओं में जंगल-झाड़ में ले जाकर पटक दिए। उन्हें मजबूरन वहां श्रम देकर आधी-अधूरी कमाई से अपना काम चलाना था।
दमन और लूट उत्तर ने ही झेला
चूंकि तटीय राज्यों में अंग्रेजी जानने वालों की फौज जल्द तैयार हुई। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं, निम्न शहरी धंधों, घरेलू साफ-सफाई के काम में अच्छे वेतन पर तटीय राज्यों के प्रवासी भारतीय लगाए गए। उनके माध्यम से मसाले, चाय, चीनी के उत्पाद यूरोपीय देशों के लोगों की पसंद बने। जलमार्ग ही व्यापार का एक मात्र साधन था जिससे सम्पदा का अर्जन इन क्षेत्रों ने किया। उत्तरी भारत दमन और लूट के कारण शोषण और पिछड़ेपन का शिकार होता रहा। चिदम्बरम को भारत की तरक्की और पिछड़ेपन के कारकों में भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों की समीक्षा का न तो आधार है न ही इन क्षेत्रों के इतिहास का ज्ञान है। इसलिए उनकी टिप्पणी पूर्वाग्रह ग्रस्त अज्ञानतापूर्ण अभिव्यक्ति ही मानी जा सकती है।
हिंदी के विरुद्ध षड्यंत्र
आजादी के बाद से सत्ता प्रतिष्ठानों से इन क्षेत्रों की जनभाषा हिंदी हमेशा षड्यंत्र द्वारा दूर की गई। न्याय, कानून, व्यापार, प्रशासन आदि सभी स्तरों से हिंदी का भोजन अंग्रेजी करती जा रही है। जिसके कारण सभी हिंदीभाषी राज्य भाषायी गुलामी के शिकार हुए। आजाद भारत में भी व्यापार अैर उद्योग की सम्पूर्ण भाषा अंग्रेजी हो गई। तरक्की के मुख्य दरवाजों से हिंदी खदेड़ दी गई। गृह मंत्रालय के जिम्मे संसद ने राजभाषा के पद पर हिंदी को प्रतिष्ठित कराने का काम सौंपा। चिदम्बरम के गृह मंत्रालय में आते पूरा मंत्रालय अंग्रेजी समर्थकों का अड्डा वन गया। राजभाषा समारोहों में भी गृह मंत्री और उनके अधिकारी अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं।
पिछड़े पन की जड़ में भाषायी गुलामी
आर्थिक औद्योगिक क्षेत्र में इन इलाकों के पिछड़ेपन की जड़ में भाषायी गुलामी है। उच्चशिक्षा ,चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधकीय ज्ञान का क्षेत्र अंग्रेजी के कब्जे में हो गया। अखिल भारतीय सेवाओं से पुन: हिन्दी निर्वासित कर दी गई। हिंदी क्षेत्रों के पिछड़ेपन के बुनियादी कारणों में इन क्षेत्रों का विद्रोही स्वभाव है। आजाद भारत के भी विद्रोह चाहे 1967, 1977, 1989 में हुए सभी का दायरा उत्तरी- मध्य भारत का इलाका था इसलिए षड्यंत्र रचकर दिल्ली के राजकर्ता इन क्षेत्रों को पीछे रखने की कोशिश करते हैं और इनकी गरीबी का गाहे-बेगाहे मजाक उड़ाते रहते हैं। चिदम्बरम स्वभाव से ही इन क्षेत्रों के विरोधी हैं। इतना सत्य है कि भारत में सार्वजनिक तौर पर इन क्षेत्रों का मजाक उड़ाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। विकीलीक्स के खुलासे में उनके अंदर छिपा जहर सार्वजनिक हो गया। भारत की भौगोलिक एकता के लिए इतने जहरीले व्यक्ति का गृह मंत्री की कुर्सी पर वने रहना खतरनाक है। देश की एकता, अखण्डता किसी भारतवंशी के लिए महत्त्व का विषय है। चिदम्बरम को स्मरण दिलाने की जरूरत है कि उनके जहरीले विचार देश की एकता को चुनौती देने वाले है।