Monday, March 28, 2011

शांति के लिए बलिदान


कश्मीर के हालात पर लेखक की टिप्पणी
जम्मू-कश्मीर सरकार ने अजीबोगरीब फैसला लिया है कि कफ्र्यू के दौरान भी स्कूल खुले रहेंगे। क‌र्फ्य के बावजूद स्कूल भेजने का सरकार का हुक्म बच्चों की जान जोखिम में डालने के समान है। यह सुरक्षा के बुनियादी मापदंडों का खुला उल्लंघन है। कुछ अशांत इलाकों में स्कूल बसों पर पथराव की घटनाएं हुई हैं। दरअसल, राज्य सरकार सत्ता पर अपनी पकड़ को साबित करने के लिए कश्मीर के स्कूली बच्चों को मोहरा बना रही है। इससे कई लोगों को अलगाववादी नेताओं की इस बात पर यकीन होने लगा है कि सरकार को नौजवानों के कल्याण और भविष्य की कोई चिंता नहीं है। घाटी में पिछले कुछ महीनों में पुलिस की गोलियों से काफी नौजवान मारे गए हैं। राज्य और केंद्र सरकारों के सामने कश्मीर में वैधता का संकट मौजूद है। सवाल यह है कि कश्मीर पर असल में किसका शासन है? एक ओर, अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी है, जिसकी बात ही कानून मानी जाती है तो दूसरी ओर खुद राज्य है जो पुलिस और सुरक्षा बलों के भौतिक स्वरूप में ही मौजूद रहती है तथा जिसका बलप्रयोग और दबाव में ही यकीन है। कश्मीर में सत्ता दो ध्रुवों के बीच डोलती रहती है- बलप्रयोग की राज्य की ताकत और अलगाववादियों के प्रति निष्ठा। आम कश्मीरी का धर्मसंकट यह है कि कुए और खाई में से वह किसे चुने। दुख इस बात का है कि सरकार तो बलप्रयोग और दबाव के रूप में ही काम कर सकती है, चाहे विरोध प्रदर्शनों को गोलियों, लाठियों और कफ्र्यू से दबाने की बात हो या अपनी ताकत को लादने के रूप में हो, जैसा कि स्कूली बच्चों को अशांत माहौल में स्कूल भेजने के आदेश में हमने देखा है। यह सब इसलिए कि अलगाववादियों के मंसूबों को विफल कर दिया जाए। ऐसे में हम कश्मीर में क्या उम्मीद कर सकते हैं? हो सकता है कि सरकार इस दौर को जीत जाए। यह भी हो सकता है कि कश्मीरी समाज पर दबाव के चलते, जिसे सरकार किसी भी तरीके से बढ़ा ही देती है, मौजूदा विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता कम हो जाए। लेकिन राज्य के सामने मौजूद सत्ता और वैधता का संकट दूर नहीं होगा, चाहे रोजगार, मारे गए लोगों के लिए हर्जाने अथवा मध्यस्थों के रूप में और कितने ही पैकेज आते रहें। यहां तक कि आने वाले महीनों में सामान्य स्थिति समझे जाने वाले हालात के बनने के बावजूद यह संकट किसी न किसी रूप में शायद अधिक तीव्र और हिंसक रूप ले सकता है। इस तथ्य का स्वीकारने के अलावा और कोई व्यवहारिक और उचित रास्ता नहीं है कि राजनीतिक इतिहास और भारतीय संघ से अपने संबंधों के लिहाज से कश्मीर की विशेष स्थिति है। समाधान तो बाद में भी निकाले जा सकते हैं, लेकिन सबसे पहले इस संकट को समझना जरूरी है। जैसा कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को मिली प्रतिक्रियाओं से जाहिर होता है, सीधे राजनीतिक हस्तक्षेप, यहां तक कि संभावित समझौते से कुछ जगह मिल सकती है और यही एकमात्र असल सार्थक विकल्प है। कश्मीर को भारतीय सीमाओं में बनाए रखने के लिए कई क्रांतिकारी उपाय सुझाए गए हैं। अब स्पष्ट होता जा रहा है कि समस्या केवल कश्मीर घाटी में है जम्मू और लद्दाख प्रांतों में नहीं। कश्मीर हल के प्रयास में अब्दुल्ला परिवार और यहां तक कि महबूबा मुफ्ती जैसे लोगों की कोई अहम भूमिका नहीं होगी। भारत सरकार को अलगाववादी तत्वों के साथ सीधी बात करनी होगी। इसमें एनसी और पीडीपी नेता उसकी मदद कर सकते हैं। ऐसी वार्ता में सरकार को कश्मीरियों को विशेष सीमांत श्रेणी के भारतीय बनने के लिए राजी करना होगा और भारत को कश्मीर घाटी को अ‌र्द्ध स्वायत्त दर्जा देने के लिए राजी होना पड़ेगा। शांति के लिए कुछ तो बलिदान करना ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Thursday, March 24, 2011

पगड़ी नहीं देश का हुआ अपमान


 इटली में सुरक्षा जांच के दौरान गोल्फ खिलाड़ी जीव मिल्खा सिंह के कोच अमृतेंदर सिंह की पगड़ी दोबारा खुलवाए जाने पर भारत ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। कोच अमृतेंदर के साथ एक हफ्ते के दौरान दूसरी बार हुई इस घटना पर राज्यसभा में विपक्ष के सवालों को जवाब देते हुए विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इसे देश का अपमान करार दिया। विदेश मंत्रालय ने इस मसले पर सख्त रुख अख्तियार कर इतालवी राजदूत को तलब कर सख्त लफ्जों में शिकायत दर्ज कराई। इटली के राजदूत ने घटना पर खेद जताया है और जांच का भरोसा दिलाया है। इससे पहले राज्यसभा में भी सदस्यों ने इस बात पर चिंता जताई कि धार्मिक भावनाओं की अवहेलना कर मंगलवार को दूसरी बार अमृतेंदर सिंह को मिलान एयरपोर्ट पर पगड़ी खोलने के लिए मजबूर किया गया। सदन में शून्यकाल के दौरान मामला उठाते हुए भाजपा नेता एसएस अहलूवालिया ने कहा कि सिखों की पगड़ी जांचने के लिए कई साधन उपलब्ध हैं। लेकिन अमृतेंदर के सुरक्षा जांच के दौरान पगड़ी उतार कर जूते की ट्रे में रखने के लिए मजबूर किया गया। अहलूवालिया के साथ मामले पर एक सुर सत्तापक्ष और विपक्ष के कई सांसदों ने इस बात को लेकर भी सवाल उठाए कि बीते सप्ताह हुई घटना के बाद भारत की नाराजगी के बावजूद दूसरी पर बार भी गोल्फ कोच के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार हुआ। सदन की भावनाओं से सहमति जताते हुए विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा कि सिखों की पगड़ी का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि सिखों की पगड़ी भारतीयता का प्रतीक है और इसलिए यह भारत का अपमान है। कृष्णा ने बताया कि मामले पर रोम में भी भारतीय दूतावास ने इस घटना पर शिकायत दर्ज करा दी थी। कृष्णा ने अपने मंत्रालय को इतालवी राजदूत जियाकोमो सानफेलिस डी माउंटफोर्टे को तलब करने के निर्देश दिए। बुधवार शाम मंत्रालय बुलाए गए इतालवी राजदूत को भारत ने सख्त डिमार्श (शिकायत पत्र) सौंपा है। विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) विवेक काटजू से मुलाकात के बाद मीडिया से रूबरू माउंटफोर्टे ने कहा कि इस मामले को उच्चतम स्तर पर उठाया गया है। साथ ही उन्होंने बताया कि इस घटना की जांच की जा रही है। विदेश मंत्रालय के अनुसार इतालवी राजदूत ने खेद जताने के साथ ही यह भी माना की सुरक्षा नियमों के पालन में धार्मिक भावनाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए|

Wednesday, March 23, 2011

आइएएस की परीक्षा में बैठेगा लश्कर का आतंकी


 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर आत्मघाती हमले की साजिश रचने से लेकर राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री पं. मंगत राम शर्मा पर दक्षिण कश्मीर में हुए जानलेवा हमले में शामिल रहा लश्कर-ए-तैयबा का एक कुख्यात आतंकी अब आइएएस अफसर बनना चाहता है। अदालत ने उसे इसकी अनुमति दे दी है। कश्मीर प्रशासनिक सेवा (केएएस) की प्राथमिक परीक्षा में दो बार सफल हो चुका लश्कर कमांडर शब्बीर बुखारी अब आइएएस अफसर बनना चाहता है। उसने अदालत से आइएएस की परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी। इस पर श्रीनगर के जिला सेशन जज संजीव गुप्ता ने सेंट्रल जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह जेल मैन्युल के मुताबिक उसे आइएएस की परीक्षा के लिए फार्म जमा कराने की अनुमति देने के साथ-साथ उसे परीक्षा की तैयारी के लिए आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध कराए। शब्बीर 2002-05 तक जम्मू-कश्मीर पुलिस के लिए सिरदर्द रहा है। बारामुला जिले के अंतर्गत करीरी गांव का रहने वाला शब्बीर पूर्व शिक्षा राज्यमंत्री गुलाम नबी लोन को अक्टूबर, 2005 में मौत के घाट उतारने वाला दुर्दात आतंकी है। शब्बीर ने ही कथित तौर पर 2004 में प्रधानमंत्री के श्रीनगर आगमन पर आतंकी हमले की साजिश रची थी। वह मुंबई और गुजरात के आतंकी हमलों में भी शामिल रहा है। वह 2005 के अंत में अपने एक स्थानीय आतंकी साथी के संग पकड़ा गया था और उसकी निशानदेही पर ही दो विदेशी आतंकी भी कथित तौर पर मारे गए थे|

Tuesday, March 22, 2011

नई मुश्किलों को न्योता


 कश्मीर समस्या का समाधान सुझाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर भेजे गए वार्ताकारों की टीम ने शुरू से ही जो समाधान दिए हैं, वे अकसर विवादों के कारण बने हैं। ऐसे मसले पर आने वाले सुझावों पर विवाद का उठना कोई नई बात नहीं है। विवादास्पद मसलों पर जब भी कोई समाधान पेश किया जाता है तो अकसर उसे लेकर एक पक्ष खुश होता है और दूसरा नाराज। यह भी एक राजनैतिक मसला है, इसलिए इसमें भी ऐसा होना स्वाभाविक है। लेकिन इसके सुझावों को लेकर जिन बातों पर सवाल उठ रहे हैं, वे समझ से परे हैं। यह टीम जिस तरह के सुझाव दे रही है उनसे ऐसा लग रहा है, गोया यह किसी अपराधबोध से दबी हुई है। ऐसी स्थिति में जबकि दुनिया के दूसरे प्रमुख देश इसे भारत का आंतरिक मसला मानते हैं, इसने क्या सोचकर शुरुआती दौर में ही इसमें पाकिस्तान को शामिल करने का सुझाव दे डाला, यह तर्क समझ से परे है। जाहिर है इससे जिस तरह की गंभीरता, संवेदनशीलता और गोपनीयता की अपेक्षा देश और प्रदेशवासियों को थी, उस पर यह खरी नहीं उतरी है। इसका एक ताजा प्रमाण यह है कि इसकी रिपोर्ट आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किए जाने से पहले ही राज्य की विधानसभा में इस पर बवाल हो गया। यह सिफारिश जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत (राष्ट्रपति) और वजीर-ए-आजम (प्रधानमंत्री) पदों की बहाली का है। केंद्रीय वार्ताकारों की इन सिफारिशों का पता चलते ही चर्चाएं गरम हो गई। इनके विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो गई। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी और बीते गुरुवार को इसे लेकर विधानसभा में खूब हंगामा भी हुआ। भाजपा, पैंथर्स पार्टी और जम्मू स्टेट मोर्चा ने सदन से वाकआउट भी कर दिया। जाहिर है, न केवल जनप्रतिनिधियों बल्कि आम जनता में भी इस बात को गहरे विरोध की भावना है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, यह बात सिर्फ हम ही नहीं दूसरे देश भी मानते हैं। राज्य की जनता बड़े पैमाने पर इस बात को मानती है और वह हर तरह से भारतीय संघ के साथ है। यह बात जम्मू-कश्मीर के लोग हर मौके पर और हर तरह से जाहिर कर चुके हैं। इसके बावजूद मुट्ठी भर अलगाववादी अपनी अराजक करतूतों से घाटी में जंगल राज कायम किए हुए हैं। जब भी कोई मसला आता है तो आम जनता को दरकिनार कर उनकी बात सुनी जाती है। यही वजह है कि उन्हें बार-बार शह मिलती रहती है। अभी जो राजनेता इन सिफारिशों का विरोध कर रहे हैं, उनका मुख्य तर्क यही है कि ऐसा करने से अलगाववादियों को बढ़ावा मिलेगा। यह बात सिर्फ राजनेता मानते हों, ऐसा नहीं है। ठीक यही धारणा जम्मू-कश्मीर की आम जनता की भी है। यह एक स्थापित तथ्य है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता देश की मुख्य धारा के साथ है। ठीक इसी तरह पूरे देश की आम जनता की सोच भी जम्मू-कश्मीर की आम जनता से मिलती ही है। सभी इसे पूरे भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के रिश्तों को कमजोर करने की साजिश मानते हैं। इस तर्क से इनकार कर पाना वास्तव में मुश्किल है। इन हालात को देखते हुए तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या केंद्रीय वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर की आम जनता से बात भी की है या नहीं? आखिर वे जो सिफारिशें रख रहे हैं उन सबमें अलगाववादियों की मांगों पर ही ठप्पा क्यों लगा रहे हैं? क्या आम जनता के नाम पर वे जिनसे मिले हैं, वे सभी सिर्फ अलगाववादी ही हैं? ऐसी कोई सिफारिश रखने के पहले वार्ताकारों को कम से कम ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर तो नजर जरूर डाल लेनी चाहिए थी। अगर हम इतिहास से सीख नहीं ले सकते तो उसका होना किस काम का है? यह बात लगभग पूरा भारत जानता है कि पहले कश्मीर में सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम पद ही थे। यह अलग बात है कि संवैधानिक रूप से उनके कार्य राज्यपाल और मुख्यमंत्री के ही थे। कहने को कहा जा सकता है कि नाम से क्या होता है? लेकिन नाम की इस व्यवस्था ने ही इस भ्रम को बढ़ावा दिया कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति भारत के अन्य राज्यों से कुछ भिन्न है। बेशक है, जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष सुविधाएं और अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर ऐसा अकेला राज्य है? भारत राज्यों का एक संघ है। किसी भी बड़े देश की तरह भारत के भी अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग आवश्यकताएं हैं। ये विशेष सुविधाएं या अधिकार कुछ राज्यों को इसीलिए दिए गए हैं ताकि संबंधित राज्य अपनी आवश्यकताओं की ठीक से पूर्ति कर सकें और साथ ही तेजी से विकास भी कर सकें। ठीक इसी तरह विशेष सुविधाएं समाज के कुछ समुदायों को भी दी गई हैं। ध्यान रहे, किसी भी राज्य या वर्ग को विशेष सुविधाएं इसलिए बिलकुल नहीं दी गई हैं कि वह स्वयं देश और संविधान से ऊपर समझ ले। यह बात सबसे पहले सुनिश्चित की गई है कि जिस किसी भी क्षेत्र या वर्ग को जो कुछ भी सामान्य या विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, वह संविधान के दायरे में ही है। भारतीय संविधान से ऊपर कोई कुछ भी नहीं है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इन पदनामों ने कुछ निहित स्वार्थी तत्वों को ऐसा भ्रम फैलाने का मौका दिया और नतीजा यह हुआ कि अलगाववादी सोच पनपने लगी। केवल यही नहीं, ऐसी ही कुछ और दिक्कतों को देखते हुए सन 1965 में संविधान में छठवें संशोधन के जरिये सदर-ए-रियासत को राज्यपाल और वजीर-ए-आजम को मुख्यमंत्री के रूप में बदल दिया गया। यह काम विधिवत संविधान संशोधन के जरिये किया गया था। जाहिर है, यह इन नामों के कारण फैलते भ्रम को रोकने और उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही किया गया था। पैंथर्स पार्टी के हर्षदेव सिंह की यह बात बिलकुल सही है कि इन पदों की बहाली घड़ी की सुइयों को पीछे करने जैसा होगा। सच तो यह है कि इतिहास को पीछे धकेलने का काम प्रतिक्रियावादी ताकतें ही कर सकती हैं। क्योंकि इतिहास की प्रकृति ही आगे बढ़ना है, पीछे लौटना नहीं। इसके पीछे लौटने की बात करके आखिर हम क्या साबित करना चाहते हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गए अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोएमर ने भी साफ शब्दों में कहा है कि जम्मू-कश्मीर कोई विवादित क्षेत्र नहीं है। इसे लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति शुरू से ही स्पष्ट है। हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हैं। अन्य प्रमुख देशों का भी यही मानना है। सबसे बड़ी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता का भी यही मानना है। फिर इन पदों की बहाली की सिफारिश का क्या औचित्य है? क्या इस तरह हम नई मुश्किलों को न्यौता नहीं दे रहे हैं? भारत सरकार को चाहिए कि इन सिफारिशों पर कोई फैसला करने से पहले सभी दलों से इस पर गहन विचार विमर्श करे तथा इससे जुड़े सभी पक्षों पर सोच-समझकर ही कोई निर्णय ले। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

Monday, March 21, 2011

बदल रहा है कश्मीर


कश्मीर में विकास से जुड़ने की ललक देख रहे हैं लेखक
अल्ताफ अहमद सेना में भर्ती के लिए सुबह-सुबह जम्मू-कश्मीर के गंदरबल जिले में मन्साबल सैनिक स्कूल पहंुचा। भारतीय सेना में शामिल होने के खिलाफ उसे उग्रवादियों की धमकियां मिल रही थीं, लेकिन उसने परवाह नहीं की। अल्ताफ का मुकद्दर खराब था कि सेना में उसका चयन नहीं हुआ। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और अगली बार फिर कोशिश करने के इरादे के साथ घर लौट गया। कभी सेना और पुलिस पर पत्थरों की बौछार करने वाले कश्मीर के नौजवान अब इनमें भर्ती के लिए लालायित हैं। इन दिनों सेना की भर्ती रैलियों में अकसर बड़ी तादाद में नौजवान आते हैं। दो साल पहले रंगरेथ में सेना की रैली में 8,000 से भी अधिक नौजवान जुटे थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 11 जनवरी को पहली बार श्रीनगर के खानयार इलाके में पुलिस भर्ती अभियान चलाया था, जिसमें भारी संख्या में लोग पहंुचे थे। खानयार एक संवेदनशील इलाका है, जहां घाटी में पिछली गर्मियों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच जम कर झड़पें हुई थीं। पुलिस की इस रैली में इरशाद अहमद जैसे पत्थरबाज भी आए थे। उसने बताया कि सम्मानजनक नौकरी मिलने और अपने परिवारों का भरण-पोषण का मौका मिलने पर नौजवान समाज-विरोधी कामों में अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे। इससे एक बात सामने आती है कि पिछली गर्मियों का उपद्रव अपने आप नहीं भड़का था। इसे तो घाटी में बेरोजगारी का फायदा उठाने वाले निहित स्वार्थों ने भड़काया था। सरकार इस बात को समझती है इसीलिए वह पत्थरबाजी जैसे छोटे-मोटे अपराधों को माफ करने को तैयार है। खानयार की पुलिस भर्ती के प्रभारी पुलिस महाअधीक्षक एसएम सहाय ने कहा कि जिन नौजवानों के खिलाफ पत्थरबाजी के छोटे-मोटे मामले दर्ज हैं, उनका भी इस भर्ती में स्वागत है। उग्रवाद से राज्य की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। एक दिन के बंद या कफ्र्यू से 161 करोड़ रुपए के राजस्व की हानि होती है। पिछले साल हुई पत्थरबाजी की घटनाओं से आशंका होने लगी थी कि कहीं फिर से उभरता पर्यटन उद्योग अलगाववादियों की गतिविधियों की भेंट न चढ़ जाए। वैसे तो खेती और पशुपालन राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, लेकिन पर्यटन उद्योग पर पड़ी मार से हस्तशिल्प, हथकरघा और परिवहन जैसे सहायक उद्योगों पर भी बुरा असर पड़ना तय था। लेकिन आम लोगों के साथ-साथ हुर्रियत कांफ्रेंस के लीडर सैयद अली शाह जीलानी जैसे कट्टरपंथियों को भी समझ आ गया कि उनके बंद का राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुत खराब असर पड़ रहा है। इसीलिए उन्होंने कहा कि बंदों को बंद करने का वक्त आ गया है। कश्मीर घाटी में शांति बहाल होने के साथ ही सुरक्षा की तलाश में राज्य से बाहर गए लोगों ने अपने पैतृक स्थानों को लौटना शुरू कर दिया है। वैसे, शांति बहाली में सेना की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। कोलकाता में दक्षिणेश्वर में भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की खाली जमीन पर बसे शरणार्थियों का पहला जत्था श्रीनगर लौट आया है। इस बीच केंद्र ने भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल नियुक्त किया था, जिसने जम्मू-कश्मीर के नौजवानों के लिए एक रोजगार योजना बनाई है। इसके तहत अगले पांच साल में एक लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जाएगी, जिससे उन्हें रोजगार पाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा विशेषज्ञ दल ने पांच साल के लिए एक विशेष स्कॉलरशिप योजना की सिफारिश की है, जिससे 25,000 छात्रों को फायदा होगा। 1,200 करोड़ रुपये की इस योजना में पूरी ट्यूशन फीस, पुस्तकों आदि का खर्च उठाया जाएगा। समिति की रिपोर्ट में खेती, पशुपालन, बागवानी, पर्यटन, हस्तशिल्प संबंधी कार्यक्रमों को शामिल किया गया है। साथ ही आइटी उद्योग की सफलता के लिए दीर्घावधि रणनीति बनाई गई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Friday, March 18, 2011

जम्मू-कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री पद की सिफारिश पर हंगामा



 जम्मू कश्मीर में अमन बहाली के नाम पर जम्मू-कश्मीर में सदर ए रियासत (राष्ट्रपति) और वजीर ए आजम(प्रधानमंत्री) पद की बहाली करने की केंद्रीय वार्ताकारों की सिफारिश संबंधी खबरों पर गुरुवार को विधानसभा में खूब हंगामा हुआ। भाजपा, पैंथर्स पार्टी और जम्मू स्टेट मोर्चा ने इस मुद्दे पर हंगामा मचाया और बाद में सदन से वॉकआउट कर गए। हालांकि कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। भाजपा विधायक दल के नेता चमन लाल गुप्ता ने कहा कि अगर किसी ने जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ रिश्तों को कमजोर बनाने की साजिश की तो हम उसका मुकाबला करेंगे। अलबत्ता, सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस ने वार्ताकारों की सिफारिश का स्वागत करते हुए कहा कि सभी जानते हैं कि अगर घड़ी खराब हो तो उसे ठीक करने के लिए सूई को आगे-पीछे किया जा सकता है। पैंथर्स पार्टी के हर्ष देव सिंह ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि केंद्रीय वार्ताकारों ने राज्य में वजीर ए आजम और सदर ए रियासत की बहाली की बात कर घड़ी की सुइयों को पीछे करने का प्रयास किया है। उनका कहना था कि वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर को वृहद स्वायत्तता देने का प्रयास करते हुए राष्ट्रीय सतह पर एक नई बहस और विवाद को जन्म दे दिया है। पीडीपी के निजामदीन भट्ट ने कहा कि हमें इस रिपोर्ट पर बहस की जरूरत नहीं है। वार्ताकारों की नियुक्ति केंद्र सरकार ने की है। इसके अलावा उनकी रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई है, इसलिए अभी इस मुद्दे पर बहस की जरूरत नहीं है। उनकी ही पार्टी के अब्दुल रहमान वीरी ने कहा कि हाल ही में वार्ताकारों के साथ कश्मीर आई माकपा सांसद वृंदा करात ने संसद में कहा कि कश्मीर के हालात खतरनाक हैं

Monday, March 14, 2011

कश्मीर में फिर गिरफ्तारियों से नाखुश वार्ताकार


कश्मीर के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकारों ने घाटी में हाल में हुई गिरफ्तारियों को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। राज्य की छठवीं यात्रा के अंत में संवाददाताओं से बातचीत में राधा कुमार ने कहा कि हमारी सिफारिशों के बाद युवाओं की रिहाई से स्थिति सामान्य होने में मदद मिल रही थी, लेकिन दुर्भाग्य से गिरफ्तारियों का नया चक्र शुरू हो गया है। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार केंद्रीय टीम की सिफारिशों को लागू कर रही है। साथ ही वार्ताकार नियमित आधार पर इसकी निगरानी भी कर रहे हैं। राधा कुमार ने कहा कि सुरक्षा बंकरों को हटाए जाने और अन्य सिफारिशों पर भी अमल हुआ है। उन्होंने लोक सुरक्षा कानून के अधिक इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर राज्य विधानसभा को एक कानून का बनाने के लिए कहा। राज्य में पासपोर्ट के लंबित 45,000 में 20,000 मामले निपटा दिए गए हैं। कश्मीर और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बीच यात्रा और व्यापार संबंधी अड़चनों को भी दूर किया गया है। नियंत्रण रेखा पर पीओके के निवासियों को परमिट जारी करने के लिए काउंटर स्थापित करने के केंद्र के फैसले को वार्ताकारों ने सराहा। राधा कुमार ने कहा कि यह एकतरफा कदम है और पाकिस्तानी हुक्मरानों को भी ऐसी ढील देनी चाहिए|