कश्मीर समस्या का समाधान सुझाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर भेजे गए वार्ताकारों की टीम ने शुरू से ही जो समाधान दिए हैं, वे अकसर विवादों के कारण बने हैं। ऐसे मसले पर आने वाले सुझावों पर विवाद का उठना कोई नई बात नहीं है। विवादास्पद मसलों पर जब भी कोई समाधान पेश किया जाता है तो अकसर उसे लेकर एक पक्ष खुश होता है और दूसरा नाराज। यह भी एक राजनैतिक मसला है, इसलिए इसमें भी ऐसा होना स्वाभाविक है। लेकिन इसके सुझावों को लेकर जिन बातों पर सवाल उठ रहे हैं, वे समझ से परे हैं। यह टीम जिस तरह के सुझाव दे रही है उनसे ऐसा लग रहा है, गोया यह किसी अपराधबोध से दबी हुई है। ऐसी स्थिति में जबकि दुनिया के दूसरे प्रमुख देश इसे भारत का आंतरिक मसला मानते हैं, इसने क्या सोचकर शुरुआती दौर में ही इसमें पाकिस्तान को शामिल करने का सुझाव दे डाला, यह तर्क समझ से परे है। जाहिर है इससे जिस तरह की गंभीरता, संवेदनशीलता और गोपनीयता की अपेक्षा देश और प्रदेशवासियों को थी, उस पर यह खरी नहीं उतरी है। इसका एक ताजा प्रमाण यह है कि इसकी रिपोर्ट आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किए जाने से पहले ही राज्य की विधानसभा में इस पर बवाल हो गया। यह सिफारिश जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत (राष्ट्रपति) और वजीर-ए-आजम (प्रधानमंत्री) पदों की बहाली का है। केंद्रीय वार्ताकारों की इन सिफारिशों का पता चलते ही चर्चाएं गरम हो गई। इनके विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो गई। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी और बीते गुरुवार को इसे लेकर विधानसभा में खूब हंगामा भी हुआ। भाजपा, पैंथर्स पार्टी और जम्मू स्टेट मोर्चा ने सदन से वाकआउट भी कर दिया। जाहिर है, न केवल जनप्रतिनिधियों बल्कि आम जनता में भी इस बात को गहरे विरोध की भावना है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, यह बात सिर्फ हम ही नहीं दूसरे देश भी मानते हैं। राज्य की जनता बड़े पैमाने पर इस बात को मानती है और वह हर तरह से भारतीय संघ के साथ है। यह बात जम्मू-कश्मीर के लोग हर मौके पर और हर तरह से जाहिर कर चुके हैं। इसके बावजूद मुट्ठी भर अलगाववादी अपनी अराजक करतूतों से घाटी में जंगल राज कायम किए हुए हैं। जब भी कोई मसला आता है तो आम जनता को दरकिनार कर उनकी बात सुनी जाती है। यही वजह है कि उन्हें बार-बार शह मिलती रहती है। अभी जो राजनेता इन सिफारिशों का विरोध कर रहे हैं, उनका मुख्य तर्क यही है कि ऐसा करने से अलगाववादियों को बढ़ावा मिलेगा। यह बात सिर्फ राजनेता मानते हों, ऐसा नहीं है। ठीक यही धारणा जम्मू-कश्मीर की आम जनता की भी है। यह एक स्थापित तथ्य है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता देश की मुख्य धारा के साथ है। ठीक इसी तरह पूरे देश की आम जनता की सोच भी जम्मू-कश्मीर की आम जनता से मिलती ही है। सभी इसे पूरे भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के रिश्तों को कमजोर करने की साजिश मानते हैं। इस तर्क से इनकार कर पाना वास्तव में मुश्किल है। इन हालात को देखते हुए तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या केंद्रीय वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर की आम जनता से बात भी की है या नहीं? आखिर वे जो सिफारिशें रख रहे हैं उन सबमें अलगाववादियों की मांगों पर ही ठप्पा क्यों लगा रहे हैं? क्या आम जनता के नाम पर वे जिनसे मिले हैं, वे सभी सिर्फ अलगाववादी ही हैं? ऐसी कोई सिफारिश रखने के पहले वार्ताकारों को कम से कम ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर तो नजर जरूर डाल लेनी चाहिए थी। अगर हम इतिहास से सीख नहीं ले सकते तो उसका होना किस काम का है? यह बात लगभग पूरा भारत जानता है कि पहले कश्मीर में सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम पद ही थे। यह अलग बात है कि संवैधानिक रूप से उनके कार्य राज्यपाल और मुख्यमंत्री के ही थे। कहने को कहा जा सकता है कि नाम से क्या होता है? लेकिन नाम की इस व्यवस्था ने ही इस भ्रम को बढ़ावा दिया कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति भारत के अन्य राज्यों से कुछ भिन्न है। बेशक है, जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष सुविधाएं और अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर ऐसा अकेला राज्य है? भारत राज्यों का एक संघ है। किसी भी बड़े देश की तरह भारत के भी अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग आवश्यकताएं हैं। ये विशेष सुविधाएं या अधिकार कुछ राज्यों को इसीलिए दिए गए हैं ताकि संबंधित राज्य अपनी आवश्यकताओं की ठीक से पूर्ति कर सकें और साथ ही तेजी से विकास भी कर सकें। ठीक इसी तरह विशेष सुविधाएं समाज के कुछ समुदायों को भी दी गई हैं। ध्यान रहे, किसी भी राज्य या वर्ग को विशेष सुविधाएं इसलिए बिलकुल नहीं दी गई हैं कि वह स्वयं देश और संविधान से ऊपर समझ ले। यह बात सबसे पहले सुनिश्चित की गई है कि जिस किसी भी क्षेत्र या वर्ग को जो कुछ भी सामान्य या विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, वह संविधान के दायरे में ही है। भारतीय संविधान से ऊपर कोई कुछ भी नहीं है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इन पदनामों ने कुछ निहित स्वार्थी तत्वों को ऐसा भ्रम फैलाने का मौका दिया और नतीजा यह हुआ कि अलगाववादी सोच पनपने लगी। केवल यही नहीं, ऐसी ही कुछ और दिक्कतों को देखते हुए सन 1965 में संविधान में छठवें संशोधन के जरिये सदर-ए-रियासत को राज्यपाल और वजीर-ए-आजम को मुख्यमंत्री के रूप में बदल दिया गया। यह काम विधिवत संविधान संशोधन के जरिये किया गया था। जाहिर है, यह इन नामों के कारण फैलते भ्रम को रोकने और उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही किया गया था। पैंथर्स पार्टी के हर्षदेव सिंह की यह बात बिलकुल सही है कि इन पदों की बहाली घड़ी की सुइयों को पीछे करने जैसा होगा। सच तो यह है कि इतिहास को पीछे धकेलने का काम प्रतिक्रियावादी ताकतें ही कर सकती हैं। क्योंकि इतिहास की प्रकृति ही आगे बढ़ना है, पीछे लौटना नहीं। इसके पीछे लौटने की बात करके आखिर हम क्या साबित करना चाहते हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गए अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोएमर ने भी साफ शब्दों में कहा है कि जम्मू-कश्मीर कोई विवादित क्षेत्र नहीं है। इसे लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति शुरू से ही स्पष्ट है। हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हैं। अन्य प्रमुख देशों का भी यही मानना है। सबसे बड़ी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता का भी यही मानना है। फिर इन पदों की बहाली की सिफारिश का क्या औचित्य है? क्या इस तरह हम नई मुश्किलों को न्यौता नहीं दे रहे हैं? भारत सरकार को चाहिए कि इन सिफारिशों पर कोई फैसला करने से पहले सभी दलों से इस पर गहन विचार विमर्श करे तथा इससे जुड़े सभी पक्षों पर सोच-समझकर ही कोई निर्णय ले। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
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