Monday, March 28, 2011

शांति के लिए बलिदान


कश्मीर के हालात पर लेखक की टिप्पणी
जम्मू-कश्मीर सरकार ने अजीबोगरीब फैसला लिया है कि कफ्र्यू के दौरान भी स्कूल खुले रहेंगे। क‌र्फ्य के बावजूद स्कूल भेजने का सरकार का हुक्म बच्चों की जान जोखिम में डालने के समान है। यह सुरक्षा के बुनियादी मापदंडों का खुला उल्लंघन है। कुछ अशांत इलाकों में स्कूल बसों पर पथराव की घटनाएं हुई हैं। दरअसल, राज्य सरकार सत्ता पर अपनी पकड़ को साबित करने के लिए कश्मीर के स्कूली बच्चों को मोहरा बना रही है। इससे कई लोगों को अलगाववादी नेताओं की इस बात पर यकीन होने लगा है कि सरकार को नौजवानों के कल्याण और भविष्य की कोई चिंता नहीं है। घाटी में पिछले कुछ महीनों में पुलिस की गोलियों से काफी नौजवान मारे गए हैं। राज्य और केंद्र सरकारों के सामने कश्मीर में वैधता का संकट मौजूद है। सवाल यह है कि कश्मीर पर असल में किसका शासन है? एक ओर, अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी है, जिसकी बात ही कानून मानी जाती है तो दूसरी ओर खुद राज्य है जो पुलिस और सुरक्षा बलों के भौतिक स्वरूप में ही मौजूद रहती है तथा जिसका बलप्रयोग और दबाव में ही यकीन है। कश्मीर में सत्ता दो ध्रुवों के बीच डोलती रहती है- बलप्रयोग की राज्य की ताकत और अलगाववादियों के प्रति निष्ठा। आम कश्मीरी का धर्मसंकट यह है कि कुए और खाई में से वह किसे चुने। दुख इस बात का है कि सरकार तो बलप्रयोग और दबाव के रूप में ही काम कर सकती है, चाहे विरोध प्रदर्शनों को गोलियों, लाठियों और कफ्र्यू से दबाने की बात हो या अपनी ताकत को लादने के रूप में हो, जैसा कि स्कूली बच्चों को अशांत माहौल में स्कूल भेजने के आदेश में हमने देखा है। यह सब इसलिए कि अलगाववादियों के मंसूबों को विफल कर दिया जाए। ऐसे में हम कश्मीर में क्या उम्मीद कर सकते हैं? हो सकता है कि सरकार इस दौर को जीत जाए। यह भी हो सकता है कि कश्मीरी समाज पर दबाव के चलते, जिसे सरकार किसी भी तरीके से बढ़ा ही देती है, मौजूदा विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता कम हो जाए। लेकिन राज्य के सामने मौजूद सत्ता और वैधता का संकट दूर नहीं होगा, चाहे रोजगार, मारे गए लोगों के लिए हर्जाने अथवा मध्यस्थों के रूप में और कितने ही पैकेज आते रहें। यहां तक कि आने वाले महीनों में सामान्य स्थिति समझे जाने वाले हालात के बनने के बावजूद यह संकट किसी न किसी रूप में शायद अधिक तीव्र और हिंसक रूप ले सकता है। इस तथ्य का स्वीकारने के अलावा और कोई व्यवहारिक और उचित रास्ता नहीं है कि राजनीतिक इतिहास और भारतीय संघ से अपने संबंधों के लिहाज से कश्मीर की विशेष स्थिति है। समाधान तो बाद में भी निकाले जा सकते हैं, लेकिन सबसे पहले इस संकट को समझना जरूरी है। जैसा कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को मिली प्रतिक्रियाओं से जाहिर होता है, सीधे राजनीतिक हस्तक्षेप, यहां तक कि संभावित समझौते से कुछ जगह मिल सकती है और यही एकमात्र असल सार्थक विकल्प है। कश्मीर को भारतीय सीमाओं में बनाए रखने के लिए कई क्रांतिकारी उपाय सुझाए गए हैं। अब स्पष्ट होता जा रहा है कि समस्या केवल कश्मीर घाटी में है जम्मू और लद्दाख प्रांतों में नहीं। कश्मीर हल के प्रयास में अब्दुल्ला परिवार और यहां तक कि महबूबा मुफ्ती जैसे लोगों की कोई अहम भूमिका नहीं होगी। भारत सरकार को अलगाववादी तत्वों के साथ सीधी बात करनी होगी। इसमें एनसी और पीडीपी नेता उसकी मदद कर सकते हैं। ऐसी वार्ता में सरकार को कश्मीरियों को विशेष सीमांत श्रेणी के भारतीय बनने के लिए राजी करना होगा और भारत को कश्मीर घाटी को अ‌र्द्ध स्वायत्त दर्जा देने के लिए राजी होना पड़ेगा। शांति के लिए कुछ तो बलिदान करना ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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