Monday, March 21, 2011

बदल रहा है कश्मीर


कश्मीर में विकास से जुड़ने की ललक देख रहे हैं लेखक
अल्ताफ अहमद सेना में भर्ती के लिए सुबह-सुबह जम्मू-कश्मीर के गंदरबल जिले में मन्साबल सैनिक स्कूल पहंुचा। भारतीय सेना में शामिल होने के खिलाफ उसे उग्रवादियों की धमकियां मिल रही थीं, लेकिन उसने परवाह नहीं की। अल्ताफ का मुकद्दर खराब था कि सेना में उसका चयन नहीं हुआ। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और अगली बार फिर कोशिश करने के इरादे के साथ घर लौट गया। कभी सेना और पुलिस पर पत्थरों की बौछार करने वाले कश्मीर के नौजवान अब इनमें भर्ती के लिए लालायित हैं। इन दिनों सेना की भर्ती रैलियों में अकसर बड़ी तादाद में नौजवान आते हैं। दो साल पहले रंगरेथ में सेना की रैली में 8,000 से भी अधिक नौजवान जुटे थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 11 जनवरी को पहली बार श्रीनगर के खानयार इलाके में पुलिस भर्ती अभियान चलाया था, जिसमें भारी संख्या में लोग पहंुचे थे। खानयार एक संवेदनशील इलाका है, जहां घाटी में पिछली गर्मियों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच जम कर झड़पें हुई थीं। पुलिस की इस रैली में इरशाद अहमद जैसे पत्थरबाज भी आए थे। उसने बताया कि सम्मानजनक नौकरी मिलने और अपने परिवारों का भरण-पोषण का मौका मिलने पर नौजवान समाज-विरोधी कामों में अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे। इससे एक बात सामने आती है कि पिछली गर्मियों का उपद्रव अपने आप नहीं भड़का था। इसे तो घाटी में बेरोजगारी का फायदा उठाने वाले निहित स्वार्थों ने भड़काया था। सरकार इस बात को समझती है इसीलिए वह पत्थरबाजी जैसे छोटे-मोटे अपराधों को माफ करने को तैयार है। खानयार की पुलिस भर्ती के प्रभारी पुलिस महाअधीक्षक एसएम सहाय ने कहा कि जिन नौजवानों के खिलाफ पत्थरबाजी के छोटे-मोटे मामले दर्ज हैं, उनका भी इस भर्ती में स्वागत है। उग्रवाद से राज्य की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। एक दिन के बंद या कफ्र्यू से 161 करोड़ रुपए के राजस्व की हानि होती है। पिछले साल हुई पत्थरबाजी की घटनाओं से आशंका होने लगी थी कि कहीं फिर से उभरता पर्यटन उद्योग अलगाववादियों की गतिविधियों की भेंट न चढ़ जाए। वैसे तो खेती और पशुपालन राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, लेकिन पर्यटन उद्योग पर पड़ी मार से हस्तशिल्प, हथकरघा और परिवहन जैसे सहायक उद्योगों पर भी बुरा असर पड़ना तय था। लेकिन आम लोगों के साथ-साथ हुर्रियत कांफ्रेंस के लीडर सैयद अली शाह जीलानी जैसे कट्टरपंथियों को भी समझ आ गया कि उनके बंद का राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुत खराब असर पड़ रहा है। इसीलिए उन्होंने कहा कि बंदों को बंद करने का वक्त आ गया है। कश्मीर घाटी में शांति बहाल होने के साथ ही सुरक्षा की तलाश में राज्य से बाहर गए लोगों ने अपने पैतृक स्थानों को लौटना शुरू कर दिया है। वैसे, शांति बहाली में सेना की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। कोलकाता में दक्षिणेश्वर में भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की खाली जमीन पर बसे शरणार्थियों का पहला जत्था श्रीनगर लौट आया है। इस बीच केंद्र ने भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल नियुक्त किया था, जिसने जम्मू-कश्मीर के नौजवानों के लिए एक रोजगार योजना बनाई है। इसके तहत अगले पांच साल में एक लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जाएगी, जिससे उन्हें रोजगार पाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा विशेषज्ञ दल ने पांच साल के लिए एक विशेष स्कॉलरशिप योजना की सिफारिश की है, जिससे 25,000 छात्रों को फायदा होगा। 1,200 करोड़ रुपये की इस योजना में पूरी ट्यूशन फीस, पुस्तकों आदि का खर्च उठाया जाएगा। समिति की रिपोर्ट में खेती, पशुपालन, बागवानी, पर्यटन, हस्तशिल्प संबंधी कार्यक्रमों को शामिल किया गया है। साथ ही आइटी उद्योग की सफलता के लिए दीर्घावधि रणनीति बनाई गई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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